ट्रेन और ज़िंदगी


बाहर के दरख़्त, इंसान, जानवर अमूमन सभी कुछ पीछे की ओर भाग रहा था। उसका शरीर पटरी पर दौड़ती गाड़ी के साथ तेजी से मंज़िल की ओर बढ़ रहा था, लेकिन पीछे भागते पेड़, खेत-खलिहान, उंचे-नीचे टीले, लाल टीन की झोपड़ियां मानों उसे बीते हुए समय में ले जाने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए थे।

ट्रेन की खिड़की से एक-एक करके पीछे छूटते स्टेशनों को देखकर वो सोच रहा था कि ज़िंदगी और ट्रेन में कितना कुछ एक जैसा है। ज़िदगी भी एक ट्रेन की तरह है, स्टेशनो की तरह लोग मिलते हैं और कुछ देर का साथ निभाकर आगे बढ़ जाती हैं, लोग पीछे छूट जाते हैं। ज़िंदगी कभी ज़्यादा देर नहीं ठहरती, ज़िंदगी का नाम ही हमेशा आगे बढ़ते रहना होता है, बिल्कुल एक ट्रेन की तरह।

वो ना तो कभी किसी ठहराव पर ज़्यादा देर रूका और ना ही रूकना चाहता था, क्योंकि शायद उसने ट्रेन की तरह हमेशा आगे बढना सीख लिया था। लेकिन इंसान की ज़िंदगी और ट्रेन के सफर में कुछ फर्क भी होता है। इंसान अपनी ज़िंदगी के पहियों को कितनी ही रफ़्तार से भगा ले, लेकिन दिमाग के किसी कोने में सुन्न पड़ी यादें उसकी तेज रफ्तार ज़िंदगी के पहियों को थामने के लिए काफी हैं। मानो ज़िंदगी लोहे के पहियों पर भागती ट्रेन हो और यादें ब्रेक। जो पल भर में ही उसकी रफ़्तार थाम लेती।

उसकी ज़िंदगी के तेज रफ़्तार पहियों को आज अतीत की यादों ने थाम सा लिया था। आंखें मूंदकर उसने जब यादों के झरोखे में झांका तो बरसों से मन के किसी कोने में दबी हुई आवाज़ अचानक तेज हो गई...

"कुछ दिन बाद मुझे भी वहां बुला लेना, तुम मुझसे और इस शहर से अपना साथ तो खत्म कर चले हो, लेकिन पुरानी यादें तुम्हारी ग़ैरमौज़ूदगी में भी मेरे साथ हैं।" कॉफी का प्याला हाथ में पकड़े लड़की ने नज़रे झुकाकर कहा। वो अक्सर यूं ही नज़रे झुकाकर बात करती थी। मानो मुझसे बात करते हुए कुछ गुम हो जाता था और वो उसे तलाशने के लिए नज़रे झुका लेती थी। लड़की की केवल नज़रें झुकी होती, लेकिन उसकी पलकें नहीं झपकती। एकटक बिना पलकें झपके वो काफी के कप में तैरते बुलबुलों की झाग को देखती रहती, बुलबुले...छोटे-छोटे कई बुलबुले..एक दूसरे के साथ चिपके हुए गर्म कॉफी के कप में इधर से उधर तैरते रहते।

एकाएक गर्म कप को थामे उसके हाथों पर लड़के के बर्फ से ठण्डे हाथों का स्पर्श होता तो उसका ध्यान टूटता, या शायद वो ध्यान भंग होने का बहाना करती।

गाड़ी छूटने के वक़्त में अभी लगभग चार घण्टे का समय बाकी था। उसे ये मालूम नहीं था कि दुबारा कब वो इस शहर में आयेगा, ये शायद उन दोनों की आखिरी मुलाकात थी। आज वो दोपहर से ही साथ थे। पिछले कई सालों में उसने शहर के कई हिस्सों को छान डाला था। हनुमान मंदिर के सामने का ये कॉफी होम उसे पसंद था। वो अक्सर एक-दो अख़बार और एक कप कॉफी के साथ वहां घण्टों गुज़ार देता था। अगर कभी जेब में ज़्यादा पैसे हों तो वो कॉफी का दूसरा कप भी ले लेता था। यहां उसे सुकून मिलता था। यहां बैठने पर शहर के दूसरे कॉफी शॉप्स की तरह कोई उठाने या समय ख़त्म होने की याद दिलाने नहीं आता।

अख़बार के पन्नों की ख़बरों को पढ़ते पढ़ते जब वो ऊब जाता तो अपने आस-पास बैठे लोगों चेहरे पढ़ने लगता। लेकिन ये चेहरे भी अख़बार की ख़बरों की तरह ही उसे बासी से लगे। ये बासी शक्लों वाले लोग उसकी ही तरह सुबह ही यहां आकर बैठ जाते और कुछ कप कॉफी की बदौलत पूरी बेंच कब्जाये रहते। यहां आने वाले अधिकतर लोगों में उसने बुजुर्गों को देखा था, जो अक्सर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ तब तक गप्पे मारते रहते जब तक वहां का चौकीदार काफी होम बंद होने की सूचना ना दे देता।

शेड पर लटके बल्ब से पीले रंग की रोशनी के कुछ टुकड़े छिटककर लड़की के मुंह पर गिर रहे थे, जिससे वो लड़की के चेहरे पर फैली खामोशी को पढ़ पा रहा था। ऐसी ख़ामोशी जो शायद चीख-चीख कर कह रही थी कि मुझे यहां अकेले मत छोड़ो...तुम जिस अकेलेपन को मेरे साथ छोड़कर जा रहे हो वो मेरी ज़िंदगी के खालीपन को कभी नहीं भर सकता।

अचानक उसे लगा कि उसके चेहरे की खामोशी भी अब चीख-चीख कर थककर शांत हो चुकी है और वहां एक सन्नाटा फैल चुका है। सर्द मौसम के सन्नाटे को अचानक चौकीदार की सीटी की आवाज़ भेदती है...समय खत्म...कॉफी होम बंद करने का वक़्त हो गया।

अभी भी ट्रेन के जाने में एक घण्टे से ज़्यादा समय है। इससे पहले कभी उन्हें एक घण्टा इतना क़ीमती नहीं लगा और जो क़ीमती होता है वो बहुत कम या सीमित होता है। कॉलेज के बाद वो अक्सर दोस्तों के साथ या अकेले इस जगह अपनी शाम गुजारते थे, लेकिन उन दिनों वहां से लौटते हुए कभी इतना दुख नहीं हुआ, जितना कि आज हो रहा था।

क्नाट प्लेस की गोल सड़कों पर चलते-चलते आज उसने लड़की का हाथ अपने हाथों में ले लिया। जाने क्यूं उसने ऐसा किया। आज से पहले उसने सड़क पर चलते हुए कभी खुद आगे बढ़कर लड़की का हाथ नहीं पकड़ा था। वो अक्सर कहा करता था कि सड़क और एकांत में कुछ अंतर होता है और उस अंतर को मिटाने की कोशिश करना नादानी है, लेकिन आज उसने खुद इस अंतर को मिटा दिया था। इस समय वो उसके और अपने बीच किसी भी अंतर को नहीं रहने देना चाहता था। शायद इसीलिए सड़क और एकांत के अंतर की परिभाषा भूल आज उसने समाज की परवाह नहीं की और वो बेफिक्र हो लड़की के साथ क्नाट प्लेस की गोल सड़कों पर चलने लगा।

"यहां से कहां जायेंगे" - लड़की ने पूछा।

"कहीं नहीं...थोड़ी देर यहीं टहलते हैं फिर स्टेशन चलेंगे" - उसने कहा।

स्टेशन शब्द सुनते ही वो पहले से भी ज़्यादा खामोश हो जाती और नज़रें झुका कर उसके साथ चलने लगती। खामोशी की भी अपनी एक भाषा होती है। एकदम संक्षिप्त और स्पष्ट। बिना आवाज़ के भी सब कुछ कह देती है । इस वक़्त हम दोनों की हालत हमारी उन हथेलियों की तरह है जो अभी सबसे नज़दीक है, यह जानते हुए भी कि कुछ ही समय में उन्हें ज़ुदा होना है। इस वक़्त हमारे बीच ना कोई शिकायत है और ना ही कोई सवाल। सिर्फ खामोशी ही हमारे साथ है।

हमें अब चलना चाहिए- उसने कहा।

लड़की ने कुछ नहीं कहा। वो अब भी खामोश रही, जैसे उसने ठान लिया हो कि उसके चले जाने के बाद अब खामोशी ही उसका साथी है।

दोनों पैदल ही स्टेशन की ओर चलने लगे। आउटर सर्किल पर चलते हुए रीगल सिनेमा से कुछ ही दूर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन है। पंद्रह मिनट का स्टेशन का रास्ता लड़की को अपने जीवन का सबसे कठिन समय महसूस हो रहा था। इन पंद्रह मिनटों के बाद वो एक ऐसे इंसान को अपने से दूर कर देगी जिसे वो कभी खोना नहीं चाहती। लेकिन वक़्त कभी नहीं रूकता, परिस्थितियां बदल जाती हैं, वक़्त अपनी चाल से हमेशा चलता रहता है।

गाड़ी छूटने का समय हो गया है। अभी कुछ ही देर पहले तो उसने कहा था कि ट्रेन के जाने में एक घण्टा बाकी है और इतनी जल्दी एक घण्टा ख़त्म हो गया। इस एक घण्टे में वो किस-किस पल को महसूस करती और आने वाले समय के अकेलेपन को दूर करने के लिए कितनी खुशियां बटोरती।

अक्सर झुकी रहने वाली नज़रें इस क्षण उसकी ओर देख रही थी, लेकिन आज वो नम थी। हमेशा खामोश रहने वाले होठों से सिसकियों की आवाज़ को वो महसूस कर रहा था। प्लेटफार्म पर खड़ी लड़की की नज़रें उसे ट्रेन की खिड़की से एकटक देख रही थी। अचानक उसने पलकें बंद कर ली, मानों उसकी आखिरी तस्वीर को वो आंखों में कैद कर लेना चाहती हो। पलक उठाते ही आंखों में कैद आंसू की कुछ बूंदे उसके गालों से लुढ़कते हुए जमीन पर गिरी और सूखी जमीन पर गीलेपन का एक बिंदु सा बना डाला।

और आखिर ट्रेन चल पड़ी...ट्रेन की खिड़की से उसने लोगों की भीड़ में अकेली खड़ी उस लड़की को देखा जिसके आंखो से टपके आंसुओं से जमीं का बिंदु फैलकर अब बड़ा हो गया था।

नई दिल्ली रेनवे स्टेशन पर आपका स्वागत है...लाउडस्पीकर से निकली इस आवाज़ ने उसे अतीत से वर्तमान में पहुंचा दिया। बरसों बाद वो फिर उसी स्टेशन पर है, जहां उसने किसी से वापस लौट आने का वादा किया था। लेकिन आज उसकी मंजिल कुछ और है, वो आज भी यादों के उस शहर का कुछ ही देर का मेहमान है। कुछ ही देर में ट्रेन चल पडेगी और दूसरा स्टेशन आयेगा, कयोंकि ट्रेन कहीं भी ज़्यादा देर नहीं ठहरती, ज़िंदगी की तरह...