दरअसल...तुम नीरस हो...।


ज़दीक होता हूँ जब तुम्हारे...
एक रोमांच होता है मेरे भीतर...
कितनी ही अभिलाषाएँ
मेरे मन में जन्म लेती हैं...
अभिलाषाएँ जो खुद ब खुद पनपती हैं...
और बढती ही जाती हैं...
वो कभी ख़त्म नहीं होती...
तुम मेरा विश्वास करो
इन पर मेरा नियंत्रण भी नहीं...
पर अफ़सोस
मेरी अभिलाषाएँ कुछ ऐसी हैं...
जो कभी पूरी नहीं होती

दूसरी तरफ
एक तुम हो...
शान्त...
निस्वार्थी...
अभिलाषाएँ तो हैं तुम्हारे भीतर भी
लेकिन शायद वे मृत हैं...
शुष्क हैं
तुम्हारी भावनाओं की तरह...

दरअसल
तुम नीरस हो...।

एक सवाल... सिर्फ तुम्हारे लिए


ये तेरे शब्द ही हैं...
जो मुझे तेरे पास खींच लाते हैं...

तेरे ख़्याल मुझे...
अपने से लगते हैं...

महसूस करता हूँ कि...
कोई मुझसा भी सोचता है...

कोई है जो...
मुझको भी समझता है...

बावजूद इसके...

मैं चाहता हूँ तुझसे...
सुनना कुछ ख़ास...

कुछ बातें...
जो हो सिर्फ मेरे लिए...

जानता हूँ कि तेरे लिए...
मेरे वक़्त में...
शब्दों के मायने बदल जाते हैं...

जानता हूँ कि...
मेरे सामने होने पर...
शब्दों की जगह...
भावनायें ले लेती हैं...

और रह जाती है...
सिर्फ ख़ामोशी...

ऐसा क्यों होता है अक़्सर कि...
मेरे हिस्से में आती हैं सिर्फ तुम्हारी ख़ामोशी ?


हर रोज़ एक ग़लती


हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...

जानते हैं...

समझते हैं...

फिर भी अन्जान बने बैठे हैं दोनों...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...


मालूम है दोनो को ही...

वाक़िफ़ हैं अन्जाम से भी...

जानते हैं उनका हश्र भी...

फिर भी अन्जान बने बैठे हैं...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे हैं...


खो रहे हैं हर रोज हम एक-दूसरे में...

हो रहे हैं मदहोश पल-पल...

किये जा रहे हैं प्यार हम...

एक दूसरे के हुए जा रहे हैं हर पल...


लेकिन सब जानकर भी...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...।

.

अब समय आ गया है धर्मनिरपेक्षता विरोधी और साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करने वाले ब्लागर्स एवं ब्लाग के प्रचार को खत्म करने का

( आज ये पोस्ट केवल इसलिये नहीं लिख रहा कि आप सबका ध्यान आकर्षित करूँ और ना ही किसी तरह की प्रसिद्धि बटोरना मेरा मकसद है। केवल ये सोच कर लिख रहा हूँ कि किसी को तो शुरूआत करनी होगी। पोस्ट का शीर्षक आपको किसी और के पोस्ट की नकल ज़रूर लग रहा होगा लेकिन ऐसा करना ज़रूरी था। )

पिछले चार महीने से ब्लागिंग कर रहा हूँ। शौकिया तौर पर करता हूँ और अभी भी नौसीखिया ही हूँ। जब शुरूआत की थी तब भी ज़्यादा नहीं लिखता था और आज भी ज़्यादा नहीं लिखता हूँ। लेकिन आजकल ब्लागिंग की दुनिया में डूबा ज़रूर रहता हूँ। अच्छा लगता है दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बैठे लोगों के विचार पढना और जानना। ब्लाग की आज़ादी की भी सीमा नहीं हर कोई जो मन में आता है लिख देता है अब जैसे मैं ही लिख रहा हूँ। लेकिन हम में से ही कुछ लोगों ने यह सोच लिया है कि वे कुछ भी लिखेंगे और कोई कुछ नहीं बोलेगा। ब्लाग की दुनिया में साम्प्रदायिकता और धर्म के नाम पर भडकीले लेख लिखने वालो का विरोध करने के लिये ही मैं आज ये पोस्ट लिख रहा हूँ।
दरअसल आज जब कुछ ब्लाग खंगालता हूँ तो बहुत ही तुच्छ मानसिकता से प्रभावित लोगों के लेख पढने को मिलते हैं। मालूम नहीं कि लोग ऐसा क्यों लिख रहे हैँ ? मुझे मालूम है कि ऐसी पोस्ट लिखने वाले लोगों के ब्लाग तो बहुत अधिक पढा जाता है। लेकिन क्या दूसरे धर्मों को नीचा दिखाना, लोगों में किसी सम्प्रदाय के प्रति गलत प्रचार करना, सार्वजनिक रूप किसी भी मुद्दे पर बिना तर्क के एकतरफा राय देना, किसी भी धर्म के प्रति नफरत का भाव दिखाना, किसी सम्प्रदाय के रीति-रीवाजों का उपहास उडाना और अपने रीति-रीवाजों को श्रेष्ठ ठहराना....सही है ? मेरी नजर मं तो ये सही नही हैं और मैं इन सबसे चिन्तित हूँ। मेरी तरह ही और भी कई लोग शायद ब्लागिंग के गिरते स्तर से चिन्तित हैं। इसी सबंध में मुझे एक महाशय का ई-मेल आया। ई-मेल की हू-ब-हू नकल यहाँ दे रहा हूँ -:

नमस्कार अमृत पाल सिंह जी ,

कैसे हो ? क्या हो रहा है आजकल । आपसे मेरा कोई खास वास्ता तो नहीं पर
आपके बारे में इतना सुना कि आज ईमेल के जरिये बात करने को मन व्याकुल हो
उठा । आपके ही क्षेत्र से मैं भी हूं । मित्र मेरा आपको मेल करने के
पीछे कुछ खास मकसद है । सर्वप्रथम मैं कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर आपकी अपनी
राय जानना चाहता हूँ ।

१- ब्लागिंग में जितने भी धर्म , जाति , महिला विरोधी , मुसलमान विरोधी ,
सेकुलरिज्म से जुड़े मुद्दे इत्यादि पर आप जिस भी तरह की विरोधी भावना
प्रकट करते हैं क्या वह करना जायज है अगर हां तो इसके पीछे के तर्क को
सामने रखिये ।

( उदाहरण - अब समय आ गया है हिन्दुविरोधी-देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण
समर्थक सैकुलर गिरोह के भ्रामक दुष्प्रचार को खत्म करनें का "
लिंक-
http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html) (
दूसरा इसी के जुड़ा हुआ मुद्दा देखें आप -गाय काटने वालो का क्यों ना सर
कलम कर दिया जाये " लिंक
-
http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_10.html )।

२- ब्लागिंग में आप भी देख रहे होगें कि एक तरह से कम्युनिटी सी बन गयी
है । कोई किसी को गाली दे रहा है तो कई किसी को ऐसे में हम सभी को इससे
बचना होगा । हम जो कुछ भी अपने साथ नहीं करते हैं वह भला किसी और के साथ
क्यों करें । कुल मिलाकर कि भेदभाव और ईष्या और जलन वाली बातों को पीछे
छोड़कर आगे बढ़े ।

३- अमृत पाल जी जिस तरह से हिन्दू और मुस्लिम विरोधी कमेंट दिये जाते हैं
बेनामी से और नाम से उससे आप भी शायद ही सहमत हो । हम सभी पढ़े लिखें हैं
और इस तरह के कृत्य सही तो नहीं माना जाना चाहिए । इससे बचाव करना होगा ।

४ - साथ ही मुझे तो ब्लागिंग से अब चिढ़ सी होने लगी है कारण स्पष्ट है
कि हम किसी से असहमत होते हैं तो लोगों को बुरा लगता है ऐसे में एक
सकारात्मक बहस संभव नहीं हो सकती । हां उलटे ही लोगों अगली पोस्ट आपके
नाम से जरूर कर देंगें ।



आप को मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफी चाहूंगा और एक सकारात्मक उत्तर
की प्रतिक्षा करूंगा ।


इस पोस्ट में अपने विचार लिख रहा हूँ इसलिये मेल करने वाले व्यक्ति का नाम नहीं लिखूँगा। हाँ...लेकिन मेल में दिये गये ब्लाग लिंक देने में परहेज नहीं करूँगा। क्योंकि जो गलत कर रहा है उसका विरोध ज़रूर करूँगा। ये विरोध केवल मेरा ही नहीं है और भी कई अन्य ब्लागर्स ऐसे वाहियात और भडकाऊ ब्लाग्स का विरोध टिप्पणियों के माध्यम से करते हैं लेकिन हैरत की बात यह है कि ऐसे भडकाऊ लेख लिखने वाले ब्लागर्स टिप्पणियों के ज़वाब भी बेहद असभ्य भाषा में देते हैं।
मुझे हैरत होती है ऐसे लेख लिखने वालों पर और ऐसे ही लेखों पर प्रशंसा रूपी टिप्पणियाँ करने वाले लोगों पर भी। मानवता विरोधी ऐसे विचारों पर ये टिप्पणी करना कि " क्या बात...क्या सुन्दर आलेख है " कहाँ तक जायज़ है ? यह तो समाज विरोधी और हानिकारक तत्वों को बढावा देना है। और बढावा भी केवल इसलिये ताकि कहीँ उनकी विरोधी टिप्पणियों से आहत होकर वो ब्लागर उनके पोस्टों को पढना ही ना छोड दे।
कई ऐसे ब्लाग पढने और उन पर आई टिप्पणियाँ पढकर मुझे बहुत दुख हुआ कि ऐसे प्रदूषित मानसिकता वाले ब्लागर्स को प्रोत्साहात्मक टिप्पणियाँ देने वाले लोगों में ब्लाग जगत के कुछ ऐसे धुरंधर भी शामिल होते हैं जिनकी लेखनी का मैं प्रशंसक हूँ और जिन्हें मैं आदर्श मानता हूँ। ऐसे ब्लागर्स से मेरी अपील है कि समाज में सस्ती लोकप्रियता हासिल कर शोहरत पाने वाला ऐसे लोगों का बहिष्कार और इन्हे और अधिक प्रोत्साहन ना दें।
जानता हूँ कि आप में से कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे। मैं परवाह नहीं करता। आप सभी का सहयोग मिलेगा तो बहुत खुशी मिलेगी।
अन्त में एक बात और कहना चाहूँगा कि
" मैं इसी तरह ज़हर उगलता रहूँगा....ना तो धर्म के खिलाफ़....ना देश के खिलाफ़.....और ना ही संस्कृति के खिलाफ़....केवल समाज में व्याप्त इन साम्प्रदायिक कीटाणुओं के खिलाफ़....जिन्हें मजा़ आता है हर बात पर धर्म और संस्कृति का ढोल पीटने में.....जो स्वयं ही पीडित हैं छोटी मानसिकता नामक गंभीर बीमारी से। "

" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "

बस के पिछले दरवाजे से चढते हुए ही उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। शायद बसों का किराया बढने का गुस्सा था भीतर जो डीटीसी की छोटी इकाई यानि कंडक्टर पर निकलने को आतुर हो रहा था। उनकी उम्र लगभग 65-70 साल थी। दरअसल ड्राईवर ने बस को स्टैंड से कुछ आगे रोका था और जब बस रूकी तो कंडक्टर ने भी ठेठ हरियाणवी में चलाये गये शब्दों के बाण से धकियाते हुए उन्हे अन्दर घुसने को कहा ( अगर ये दिल्ली परिवहन निगम की जगह ब्लू लाईन बस होती तो शर्तिया कंडक्टर उनको शब्दों के बाण की जगह अपने हाथों से धकियाता, लेकिन सरकारी कर्मचारी को अपनी कुर्सी से बडा प्रेम होता है सो कंडक्टर महोदय ने भी बिना अपना जगह से हिले सिर्फ़ शब्दों के ही बाण चलाये ) ।
इन्हीं शब्दों के बाणों से आहत बुजुर्ग के मुँह से आखिरकार कुछ शब्द फूट ही पडे। और वो शब्द थे-
" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "
बस की कुर्सियों से चिपके कुछ लोगों की ज़ुबान से दबी आवाज़ में मैंने ये कहते सुना कि " अंकल जी कंडक्टर को शिष्टाचार का पाठ तो पढा रहे हैं लेकिन खुद किस लहजे में बात कर रहे हैं। "
" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "
उस वक़्त मुझे भी यही लगा था कि शिष्टाचार का यह पाठ कितने अशिष्टाचार से पढाया जा रहा है।
मैंने सोचा भी कि अंकल जी को शिष्टाचार की सीमाओं का बोध कराऊँ।
लेकिन फिर मुझे भी शिष्टाचार का ख्याल आ गया। क्योंकि हमारे देश में बडों से सवाल-ज़वाब करना, पूछताछ करना और उन्हें अपने तर्क देना अशिष्टाचार की निशानी है ना.....।

मैं अक्सर ऐसा ही हो जाता हूँ...


अब तुझे क्या बताऊँ
कि क्या हो जाता है मुझे...

मैं अक्सर ऐसा ही
हो जाता हूँ...

जब- जब तुझमें अपनी गुम हो चुकी
पहचान को तलाशता हूँ

तलाश करते-करते
अक्सर खो भी जाता हूँ...

परेशान सा हो जाता हूँ
और सोचता हूँ
कि क्या तुझ में ही मेरा अस्तित्व है...

लौटकर आता हूँ
जब महत्त्वकांक्षाओं की इस दुनिया में
तो सर उठाती है
मेरे आत्मसम्मान की आवाज़...

सर उठाती है
बार-बार...

लेकिन भावनाओं के
बोझ तले दब जाती हैं हर बार...

और फिर मैं
तुझमें गुम हो जाता हूँ...

खो जाने देता हूँ तेरे अस्तित्व में
अपने अस्तित्व को...

इसी तरह की उठा-पटक
चलती है मेरे ज़ेहन में हर पल...

और इसी वजह से
अक्सर मैं ऐसा हो जाता हूँ...

अब तुझे क्या बताऊँ
कि क्या हो जाता है मुझे...।





माननीय प्रधानमंत्री जी के लिये पत्र


सेवा में

माननीय प्रधानमंत्री जी
भारत गणराज्य

महोदय,
यह आपके लिये मेरा दूसरा पत्र है। इसे भी हिन्दी में लिख रहा हूँ। लेकिन आज लिखते हुये डर भी लग रहा है। मालूम नहीं कि कब किधर से महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का जूता दनदनाता हुआ मेरी ओर आ जाये और मेरे मुँह पर मराठी भाषा की गहरी छाप छोङ जाये। अब मैं अबू आसिम आज़मी तो नहीं जो उनका खुलकर विरोध कर पाऊँगा और न ही कमाल आर ख़ान हूँ जो प्रतिशोध की अग्नि में सुलग कर लाखो रूपये खर्च कर एक फ़िल्म बना डालूँ। एक कहावत है ना कि यहाँ हर कोस पर पानी बदलता है और हर चार कोस पर बोली ( कहावत में अगर कोई त्रुटि हो तो एक ज़िम्मेदार प्रधानमंत्री होने के माफ़ कीजियेगा )। अब जब हर चार कोस पर भाषा और बोली बदलती है तो महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को क्या कोई विशेष अधिकार प्राप्त हैं जो हर व्यक्ति से मराठी बुलवायें और ना बोलने पर उसे पीटे। भई लोकतंत्र है जिसकी जो मरज़ी वो भाषा बोले। अगर लोकतंत्र के मायने ये होते हैं कि किसी भी व्यक्ति, समुदाय या वर्ग पर अपने बनाये हुये निर्देशों एवं कानूनों को प्रत्यारोपित किया जाये तो फ़िर संविधान में संशोधन करके राष्ट्रभाषा एवं राज्यभाषा से सम्बन्धित अधिनियमों को ही बदल डालिये।
पिछले कुछ समय से उत्तर भारत के लोगों के प्रति तिरस्कारपूर्ण हमले बढे हैं। मुझे मालूम है ( दरअसल सभी को मालूम है ) कि आप बिना ऊपरी निर्देश के कुछ नहीं बोलते, लेकिन ऐसे क्रियाकलापों जिनसे आम नागरिक के अधिकारों का हनन होता है और सीधे तौर पर भारतीय संविधान का उल्लंघन होता है, पर आपकी चुप्पी मुझे नागवार गुज़रती है। अब आप ही बताईये कि देश के नागरिक क्या मुंबई की दुकानों के साईनबोर्ड हैं जिन पर जब मर्ज़ी जबरन " मराठी भाषा हर हाल में अपनाओ आन्दोलन " की कूची चला दी ? हम तो भारतीय हैं सरकार। स्वतंत्रता के अधिकार अनुच्छेद 19 से 22 के तहत हमें अधिकार प्राप्त हैं देश में कहीं भी रहने और किसी भी भाषा में बोलने का।
15 अगस्त को लाल किले की ऊँची दीवार पर खङे होकर बुलेट प्रूफ़ काँच के पीछे से भाईचारे का संदेश देना शायद बहुत आसान है लेकिन क्षेत्रवाद और भाषायी राजनीति में पिट रहे और अपमानित हो रहे उन अभागे भारतीयें का दर्द समझ पाना बहुत मुश्किल है। आपसी सौहार्द में किरकिरापन लाने वाली घटनायें तो आप देखते और सुनते भी होंगे। ऐसे में आप उन्हें देख कर विचलित नहीं होते ? अगर आप सैकङो लोगों को मानवीयता और भाईचारे का भाषण दे सकते हैं तो उसी भाईचारे और अखण्डता के टुकङे होने का शोर आपको क्यों महसूस नहीं होता ?
और अगर आप उस शोर को सुनकर भी अंजान बने बैठे हैं तो मेरा यह पत्र पढकर भी आपको कोई फ़र्क नहीं पडेगा। लेकिन आशावादी होने की प्रवृत्ति पत्र लिखने पर मज़बूर कर रही है। वैसे मैं जानता हूँ कि आपको कोई फर्क नहीं पङेगा क्योंकि " महाराष्ट्र के सुनियोजित परिवर्तन " में जी-जान से जुटी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की बर्बरता का शिकार आम आदमी ही है आप नहीं। और दर्द उसी को महसूस होता है जिसे काँटा चुभता है।


धन्यवाद।

भवदीय-

अमृत पाल सिंह
( धर्म, संस्कृति एवं भाषा की कृत्रिम दीवार को मानवता के हथौङे से तोङने पर आमादा भारत का नागरिक )

पुरानी यादें

(आज अपनी पुरानी डायरी को टटोल रहा था तो 2 पन्ने हाथ लगे। 8/7/2003 वक़्त रात 9.45 पर लिखी हुई एक कविता मेरे हाथ लगी है। आज देखी तो हँसी आ गयी। उस समय शायद लिखते हुये कुछ अलग ही भावनायें रही होंगी मेरी। प्रेम में ख़ुद को कवि समझने लगा था शायद...और प्रेम भी प्रेम नहीं...केवल कुछ दिनों का ऐसा अतिआवश्यक आकर्षण कि जिसके बिना सारी दुनिया सूनी लगने लगती थी। सभी की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे पल ज़रूर आते हैं। ऐसे ही प्रेम से सराबोर होकर और भावनाओं के आवेग में तिनके की तरह बहकर मैंने जो कुछ भी लिखा उसे ज्यों का त्यों अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रहा हूँ। कविता एक ऐसी लड़की को ध्यान में रखकर लिखी गई है जिसके आकर्षण में मैं धृतराष्ट्र बन चुका था। बाकी आप स्वयं इस कविता में पढिये............)

हाय मेरा दुर्भाग्य
A Real Sad Story


दो साल वो हुई थी फ़ेल
इन दो सालों में उसने किया था काफ़ी लम्बा relief

इसी बात को जानकर मैंने सोचा
मुझको क्या पहुँचा सकती है वो तकलीफ़

उसकी त्रिवर्षीय योग्यता को देखकर
मैंने भी अपनी योग्यता को कम न समझा

मैंने सोचा कि
अगर उसके पास है कला
तो हमने भी ले रखी है ज्यामितीय कला

अगर उसके पास है गृहविज्ञान
तो हमारे भी पास है उच्च विज्ञान

अपने दिमाग के घमण्ड को कम किये बिना
मैंने उत्तीर्ण कर ली ग़हपरीक्षायें नम्बर कम किये बिना

इसी बीच कॉलेज में इतिहास-भूगोल के मास्टर
से ले लिया था पंगा
इसके प्रतिशोध में उसने मेरी इज़्जत को
किया था सबके सामने नंगा

जल्द ही निकट आ रहे थे दिन बोर्ड परीक्षा के
साथ ही शुरूआत होने जा रही थी सचिन तेंदुलकर की परीक्षा की

बोर्ड परीक्षाओं के मध्य में ही हो गया था वर्ल्ड कप
शुरू
इसी बात को ले कर नाराज़ हो रहे थे सभी अध्यापक और
गुरू

बोर्ड परीक्षा को भूलकर हम कर रहे थे होली खेलने की तैयारी
उस वक़्त वो लड़की कर रही थी अंग्रेजी की तैयारी

बिना किसी मुश्किल के हमने दे दिये बोर्ड के पेपर
परिणाम के दिन हम सब मिलकर पलट रहे थे रिजल्ट का पेपर

परिणाम संतोषजनक रहा
हुआ मैं द्विताय श्रेणी से पास
लेकिन मम्मी-पापा और सबको
लग रही थी प्रथम श्रेणी की आस

मैंने दी दिल को दिलासा
और पूछा
उस लड़की का क्या हुआ
क्या वो हो गई पास
किसी ने कहा
तोड़ दिया उसने तुम्हारा विश्वास
वो तो हो गयी प्रथम श्रेणी से पास

मैंने सोचा,
यो तो शायद उसका जादू-मंतर था
बस गृह विज्ञान और गणित का ही अंतर था

हाय मेरा दुर्भाग्य

मैं तो ये सब सुन के चौंका
निकल गया अब हाथ से मौका...

THE END

8/7/2003 9.45 P.M.

(लाल रंग से हाईलाईट की हुई सामग्री हू-ब-हू मेरी डायरी के 2 पन्नों की नकल है। शब्दों को भी बिना बदले एवं परिवर्तित किये वैसे ही प्रकाशित किया है जैसे उस वक़्त लिखा था। धन्यवाद।)

अब मान भी तो जाओ...




यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।
इस पल-पल सुलगती ज़िन्दगी को
यूँ नाराज़गी में ना गंवाओ।

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

क्या दोष होता है मेरा ?
या मुझसे हो जाती है कोई ख़ता।
हर रोज रूठकर मुझसे...
आखिर मिलता क्या है तुम्हे ?

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

हर पल तुम्हे मनाकर...
अब मैं भी थक चुका हूँ...
इस गैरज़रूरी रिश्ते से...
अब मुक्ति चाहता हूँ।

फिर भी
एक आखिरी दरख़्वास्त है तुमसे...

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नमूना


जामिया मीलिया इस्लामिया में एक स्थान पर लगे इस पोस्टर में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश को विश्व का नम्बर -1 आतंकवादी करार दिया गया है।

द्वितीय देवदास गाँधी स्मृति व्याख्यान जामिया मे सम्पन्न


नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2009 - महात्मा गाँधी के पुत्र देवदास गाँधी की याद में द्वितीय देवदास गाँधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन शुक्रवार को जामिया मीलिया इस्लामिया में किया गया। व्याख्यान का विषय था " गाँधी और अहिंसा की संभावना " । व्याख्यान का आयोजन जामिया में चल रहे तीन दिवसीय तालीमी मेले के अंतर्गत हिन्दी विभाग द्वारा कराया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शमीम हनफ़ी ने की एवं विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध इतिहासकार सुधीर चन्द्र को आमंत्रित किया गया था।
गौरतलब है कि महात्मा गाँधी ने अपने सबसे बड़े पुत्र देवदास गाँधी को सन् 1928 में हिन्दी की पढ़ाई के लिये जामिया भेजा था। जामिया में रहकर उन्होने हिन्दी की पढाई के साथ - साथ खादी का प्रचार भी किया। दे्वदास गाँधी छात्रों के बीच इतने लोकप्रिय थे कि जामिया के छात्रों नें उन्हे " अंजुमने - इत्तेहाद " की आजीवन सद्स्यता देकर सम्मानित किया था। वे 1930 तक जामिया में रहे। देवदास गाँधी के जामिया से लगाव एवं योगदान के चलते इस व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह इस व्याख्यान का द्वितीय आयोजन था। इससे पहले प्रथम व्याख्यान को स्वयं देवदास गाँधी के सुपुत्र एवं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी ने प्रस्तुत किया था।
कार्यक्रम की शुरूआत जामिया मीलिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष अब्दुल बिस्मिल्लाह ने की। इस मौके पर इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने देवदास गाँधी के जीवन की कई घटनाओं से अवगत कराया। उन्होनें देवदास गाँधी के खादी आन्दोलन एवं नमक सत्याग्रह आन्दोलन में योगदान पर भी चर्चा की।
व्याख्यान का उद्देश्य भविष्य मे गाँधी के आदर्शों एवं अहिंसा की परिकल्पना पर चर्चा करना एवं छात्रों को देवदास गाँधी के व्यक्तित्व से अवगत कराना था। व्याख्यान की अध्यक्षता शमीम हनफ़ी ने की। कार्यक्रम के आयोजन में अब्दुल बिस्मिल्लाह, दुर्गा प्रसाद गुप्त एवं चन्द्र देव यादव ने विशेष योगदान दिया।

क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?

आजकल मुझे हिन्दी के प्रति विशेष लगाव हो गया है। हर कार्य में हिन्दी की प्रयोग कर रहा हूँ। ज़्यादा से ज़यादा हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करता हूँ। लिखने में भी हिन्दी का ही इस्तेमाल करता हूँ। यहाँ तक की मेरे इस हिन्दी प्रेम से कम्प्यूटर और मोबाईल भी अछूता नहीं रहा। सोशल नेटवर्किंग में भी पूर्णरूप से हिन्दी। पराकाष्ठा तो यह है कि मोबाईल द्वारा संदेश भी अब हिन्दी में ही भेजता हूँ।
दरअसल हिन्दी के प्रति यह विशेष झुकाव तब हुआ जब मेरे कुछ शुभचिन्तकों ने मुझे बताया कि मेरी हिन्दी वर्तनी में बहुत सी अशुद्धिया हैं। उस वक़्त मुझे बह्त शर्मिन्दगी महसूस हुई थी कि खुद को हिन्दुस्तान का नागरिक कहने वाला इन्सान अगर ठीक से हिन्दी ही नहीं बोल सकता तो यह चिंता का विषय है। उसी समय मैनें सभी कार्य हिन्दी में ही करने का संकल्प लिया.......जो अभी तक चल रहा है। मैनें यह ठान लिया कि अपने सभी कार्य हिन्दी में ही किया करूँगा......आखिर राष्ट्रभाषा है भई। एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते अगर मै अपने स्तर पर ही हिन्दी के विकास के लिये कार्य करता हू तो इससे दूसरो को भी प्रेरणा मिले शायद।
खैर अब जब अपने दैनिक कार्यों मे हिन्दी को वरीयता दे रहा हूँ तो कम वक़्त में ही बहुत सी प्रतिक्रियायें मिलने लगी हैं। कुछ प्रोत्साहित करने वाली और कुछ मनोबल तोड़ने वाली..........। आजकल कोई मुझे झोलाछाप पत्रकार कहता है तो कोई कहता है......" क्या बात है भई आजकल तो हिन्दी में लिख रहे हो...। " अभी परसो ही एक मित्र ने मुझे ग़ालिब कहा। मालूम नहीं कि ग़ालिब क्यों कहा.....शायद मित्र ये सोचते हैं कि ग़ालिब हिन्दी में लिखते थे। हाँ अगर मित्र ने भारतेन्दु हरीश्चन्द्र, मुंशी प्रेमचंद या हजारीप्रसाद दि्वेदी कहा होता तो कुछ समझ भी आता।
अपने ही देश में हिन्दी के प्रयोग पर ऐसी प्रतिक्रेयायें पाकर मुझे दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। ऐसा लगता है जैसे अपने ही घर में जाने पर घर के सदस्य कहें कि " क्या बात है आज घर कैसे आये हो ? " ऐसे प्रश्नों को सुनकर मेरे ज़ेहन में आग लग जाती है..........अरे भई.......मेरा घर है....जब मर्जी आऊँ यार......।
आज एक सोशल नेटवर्किग वेबसाईट (अब मुझे नहीं मालूम कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट को हिन्दी में क्या कहेंगे। अभी सीख रहा हूँ भई.....पारंगत नहीं हुआ हूँ।) पर एक मित्र से गपशप करते हुए मैंने उन्हें हिन्दी में एक संदेश भेज दिया। हाँलाकि यह कोई अनोखा कारनामा नहीं था लेकिन प्रतिक्रिया वैसी ही थी......अपने ही घर में मेहमान वाली....." क्या बात है...हिन्दी ? "
मैंने कहा - हाँ।
मित्र - हिन्दी की प्रैक्टिस कर रहे होगे ?
मैने कहा - हाँ। तो इसमें दिक्कत क्या है ?
मित्र - नहीं कोई दिक्कत नहीं। तुम पत्रकारों के लिये ज़रूरी भी है। वैसे इतने हिन्दीभाषी क्यों होते जा रहे हो ?
मित्र के इस प्रश्न पर मैने गुस्से में कहा कि - देशप्रेम पनप उठा है......इसलिये हिन्दी का प्रयोग तेजी से कर रहा हूँ। जन्म के 21 साल बाद भारतीय होने पर गर्व महसूस कर रहा हू।
(वैसे मुझे मालूम नहीं कि मानव विकास सूचकाँक में 127वां स्थान रखने वाले भारत के वासी होने पर मुझे कभी गर्व महसूस भी हुआ है या नहीं......लेकिन आज भी जन..गण..मन की पंक्तियाँ सुनकर रोंगटे ज़रूर खडे हो जाते है।)
मित्र - एक बात बताओ कि खुद को भारतीय साबित करने के लिये या देश के प्रति वफ़ादार होने का श्रेय अपनी झोली में डालने के लिये.......क्या हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?
प्रश्न गम्भीर है और ता्र्किक भी। हर सवाल पर सोचने का मन तो नहीं करता लेकिन कुछ सवालों पर खुद ब खुद सोचने लगता हूँ।
क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?
मित्र तो यह सवाल उठा कर चल दिये लेकिन मेरे दिमाग में संशय छोड गये।
मैने जब इस प्रश्न पर गौर किया तो पाया कि मेरा अधिक हिन्दी प्रयोग चंद दिनों का शौक या फ़ितूर हो सकता है लेकिन क्या कारण हैं कि आज भारत मे हिन्दी की इस तरह अनदेखी हो रही है ? इसके पीछे क्या कारण है कि हिन्दी बोलने में आज लोगों को इतना संकोच होता है ?
मानव विकास सूचकाँक पर 127वें स्थान पर होने की वजह शायद स्वदेशी उदासीनता और जरूरत मे ज़्यादा विदेशी लगाव ही है। जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी होने के बावजू़द भी वहाँ की संसद के सभी कार्य परकीय भाषा अंग्रेजी में होते हैं उस देश के वासियों में अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता होना स्वाभाविक है।
वैसे तो भारत को आज़ाद हुए 60 वर्ष से अधिक हो चुके हैं लेकिन फ़िर भी भारत के 70 प्रतिशत लोग 80 रूपये से भी कम मेहनताने में अपनी गुजर - बसर करते है। विज्ञान, कला, साहित्य, खेल लगभग हर क्षेत्र में स्वय को अग्रणी की दौड में शामिल रखने वाले भारत का विश्व के भ्रष्टाचार के मामले में अग्रणी देशों की सूची में 13वाँ स्थान है। काले धन के संरक्षण के लिये विख्यात स्विस बैंक में जमा सर्वाधिक काला धन भारत का ही है। ऐसे में वैश्वीकरण की होड़ में अपनी भाषा का निरादर एवं समूचे देश के अलावा केवल चंद लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल अत्यंत खतरनाक हो सकता है।
मैं यह नहीं कहता कि विदेशी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। मैं तो केवल यह कह रहा हूँ कि हम उसका भी इस्तेमाल करें लेकिन केवल परकीय भाषा का इस्तेमाल और हर प्रणाली में इसका हस्तक्षेप कहाँ तक जायज़ है ? अपनी भाषा पर निर्भर होने के मामले में चीन और जापान एक शानदार मिसाल हैं। अपना हर काम अपनी भाषा में करने के बावजूद भी यह देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं। दरअसल इन देशों ने वैश्वीकरण की मार को अपने ऊपर पड़ने ही नहीं दिया। इन्होनें विकास तो किया लेकिन अपने देश के विकास के साथ और अपनी भाषा के विकास के साथ। जबकि भारत विकास तो कर रहा है लेकिन यहाँ घुसपैठियों को ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाया जा रहा है।
यह घुसपैठिये मुगल शासनकाल में हुई अंग्रेजों की घुसपैठ से भी ज़्यादा खतरनाक है जिसमें हमने स्वयं को इनके सामने समर्पित कर दिया है। आज हम आज़ाद तो हैं लेकिन मुनाफ़े की होड और पश्चिमी चमक - दमक में दूसरों को तो खिला रहे हैं लेकिन अपना पेट भरने में असमर्थ है और अपनी पहचान अपनी मातृभाषा हिन्दी को भूल रहे है। अपनी भाषा को भूलकर हम विदेशी रंग में रंगते जा रहे है। अगर हम इसी गति मे चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी राष्ट्रभाषा विलुप्त होने की क़गार पर आ खड़ी होगी और इसे संरक्षण देने वाला कोई नहीं होगा क्योकि आज हम यह समझने लगे हैं कि..........
" क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ? "

विज्ञापन हैं या मौजमस्ती का निमंत्रण-पत्र




आजकल समाचार पत्र पढते हुए महसूस होता है कि उसमें ज्यादातर जगह विज्ञापनों ने घेरी हुई है। बहुत अजीब लगता है जब अख़बार में ख़बरें कम विज्ञापन अधिक नज़र आते हैं। लेकिन तभी सामाजिक एवं धरातलीय वास्तविकता का सिद्धान्त दिमाग में कौंधता है कि व्यवसायिकता तो आज हर चीज़ में निहित है......और सभी क्षेत्रों की ही तरह पत्रकारिता में भी इसकी मध्यस्थता एक स्वीकृत आवश्यकता है। दरअसल व्यवसायिक विज्ञापनों के अभाव में आज किसी समाचार पत्र के अस्तित्व की परिकल्पना असंभव है।
वो शायद बहुत अच्छा वक्त रहा होगा जब वास्तव में समाचार पत्र पत्रकारिता का पर्याय हुआ करते थे और उनमें विज्ञापनों का समावेश न के बराबर हुआ करता था। कभी-कभार किसी समाचार पत्र में कोई सरकारी या गैर सरकारी विज्ञापन छप जाया करता था। धीरे-धीरे वक्त बदला......फिर पत्रकारिता बदली....और अब सब कुछ नया है। आज समाचार पत्र विज्ञापन ङायरेक्टरी में बदल रहे है। कभी-कभी तो किसी समाचार पत्र के सम्पूर्ण कवर पृष्ठ पर ही विज्ञापन होता है और ज़ाहिर सी बात है कि कवर पृष्ठ पर स्थान पाने के लिये उन्होंने काफ़ी क़ीमत चुकायी होगी।
ख़ैर...विज्ञापन दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है। बदलते सामाजिक परिवेश़ एवं आर्थिक परिस्थितियों में जीवित रहने के लिये यह संजीवनी बूटी के समान है।
मैं बहुत वक़्त से समाचार पत्र के कुछ विज्ञापनों पर ग़ौर कर रहा हूँ। अख़बार के पन्ने पलटते हुए कभी-कभी पूरा पृष्ठ ही इस श्रेणी के विज्ञापनों से पटा रहता है। 5-6 पंक्तियों के इन छोटे विज्ञापनों को देखकर पहले तो किसी को भी ये मज़ाक़िया लग सकते हैं लेकिन जब मैंने इनमें निहित भावार्थ पर गौर किया तो ये एक गम्भीर समस्या की ओर इशारा कर रहे थे। समस्या है रूपयों का लालच देकर युवाओं को ग़लत कामों की ओर धकेलना एवं लोगों को बेवक़ूफ बनाना।
दरअसल ये विज्ञापन समाचार पत्रों में "मसाज" एवं "फ्रेंङशिप" कॉलम के तहत प्रकाशित किये जाते हैं। जिनमें ''मसाज" के नाम पर एक घण्टे के लिये 10000 से 30000 रूपये तक की पेश़कश देकर युवाओं को फंसाया जाता है। जानकारी के लिये आपको बता देना चाहता हूँ कि मसाज एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तेल एवं अन्य प्राकृतिक लेप द्वारा शरीर की थकान दूर करने के लिये मालिश की जाती है। लेकिन शारीरिक थकान मिटाने की इस प्रक्रिया में आकर्षक एवं अश्लील विज्ञापनों की क्या आवश्यकता आ पङी। यह निश्चय ही जाँच का विषय है।
इस संदर्भ में जब मैंने अपने स्तर पर जाँच करने की कोशिश की एवं विज्ञापन में दिये गये दूरभाष नम्बर पर सम्पर्क साधा तो दूसरी तरफ़ से बात करने वाले व्यक्ति ने पहले तो बात करने से ही मना कर दिया। उसने कहा कि ऐसा कोई विज्ञापन उन्होनें नहीं छपवाया। समाचार पत्र का हवाला देने पर वह धीरे-धीरे मुद्दे पर आने लगा था और देखते ही देखते उसने मसाज के नाम पर 6 हज़ार रूपये में एक 18 साल की लङकी उपलब्ध कराने की पेश़कश कर ङाली। कुछ और अनसुलझे राज़ निकलवाने के प्रयास में जब मैंने पैसे ज़्यादा होने की बात कही तो उसने यह कहकर फो़न काट दिया कि " 6000 रूपये में आपको चीज़ भी तो अच्छी दिलवा रहे हैं। अगर चाहिये हो तो दुबारा फ़ोन कर लेना। "
यह निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देने वाली बातचीत थी। मुझे यक़ीन हो चला था कि अवश्य ही मसाज पार्लरों के नाम अख़बार में विज्ञापन देकर " देह व्यापार " जैसे कृत्य छुपे हुए लेकिन खुलेआम किये जा रहे हैं।
इसी प्रकार " फ्रैंङशिप " कॉलम के तहत छपने वाले विज्ञापन भी अपने अन्दर कई रहस्यों को छिपाये होते हैं जिनमें सांकेतिक भाषा का प्रयोग होता है। आश्चर्यचकित करने वाली बात तो यह है कि इन विज्ञापनों में खुलेतौर पर यह कहा जाता है कि आप जिस चाहे उस उम्र की लङकी के साथ दोस्ती कर सकते हैं। बात अगर दोस्ती तक ही सीमित रहती तो ठीक थी, लेकिन इन विज्ञापनों में खुलेतौर पर युवाओं को मौज़-मस्ती के लिये आमंत्रित किया जाता है। मसलन एक विज्ञापन में प्रकाशित किया गया है कि " खुले विचारों की सुन्दर लङकियो को मौ़ज-मस्ती के लिये युवाओं की आवश्यकता है। इच्छुक युवक सम्पर्क करें।" यहाँ मौज-मस्ती का तात्पर्य हम सभी अच्छी तरह जानते हैं। एक अन्य विज्ञापन में युवक-युवतिओं को दोस्ती के जरिये शारीरिक सम्बन्ध बनाने का न्यौता भी दिया गया है। विज्ञापनों की मौजूदगी की प्रमाणिकता के लिये मैं यहाँ विज्ञापनों की कतरनें प्रस्तुत कर रहा हूँ।
हास्यास्पद बात तो यह है कि इन विज्ञापनों में धोखेबाज़ों से सावधान रहने को भी कहा जाता है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी को हथियार बनाकर जिस तरह से कूछ लोग विज्ञापनों के माध्यम से इस प्रकार के जालसाजी एवं अश्लीलता के धन्धे में लिप्त हैं, उन्हें बढावा देने में समाचार पत्र संचालक भी कम ज़िम्मेदार नहीं। एक छोटी सी चेतावनी देकर वह स्वयं तो अपना पल्ला झा़ड लेते हैं और जानबूझकर इस गंभीर मामले से अनभिज्ञ बने बैठे हैं एवं पत्रकारिता में व्यवसायिकता के हस्तक्षेप का दुरूपयोग कर रहे हैं। जिन मामलों पर उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से लगाम लगाने की ज़रूरत है, वह उन्ही मामलों में पत्रकारिता एवं विज्ञापन का प्रयोग एक उत्प्रेरक के रूप में कर रहे हैं

दैनिक जागरण की गलती

चिट्ठाजगत

26 सितम्बर 2009 के दैनिक जागरण समाचार पत्र के राष्ट्रीय संस्करण में एक अविश्वसनीय गलती की गयी। ये गलती समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर लीड स्टोरी में की गई, जिसमें उपाय के स्थान पर उपाए मुद्रित किया गया है। आशा है कि एक राष्ट्रीय स्तर का अख़बार होने के नाते दैनिक जागरण ऐसी गलती की पुनरावृत्ति नहीं करेगा।

हर पल नई तलाश

चिट्ठाजगत

(आज तक मैंने कोई कविता नहीं लिखी। हाँ शायद एक लिखी थी, वर्ष 2004 में....अधपकी ज़वानी के अधपके आवेश में आकर। लेकिन शायद वो कविता फ़िजूल थी एवं यहाँ लिखना अनुचित होगा। आज एक कविता लिख रहा हूँ। आप सभी से अनुरोध है कि भूल-चूक माफ करें एवं किसी भी गलती पर मेरा मार्गदर्शन करें।)



क्या जो साथ हैं तेरे,
तू भी उनके साथ है ?

क्या जो सोचता है तुझे हर पल,
तू भी उन्हें सोचता है पल-पल ?

हाँ तू सोचता है...........

लेकिन चन्द लम्हों के लिये,
केवल जब तू चाहता है उन्हें सोचना,
उन्हें याद करना।

तू तभी करता है याद उन्हें,
जब तुझे उनकी जरूरत होती है,
जब तू हताश हो जाता है,
कुछ नये की तलाश में।

वरना हर पल तू भटकता रहता है इधर-उधर,
कभी इस ओर कभी उस ओर,
कभी यहाँ कभी वहाँ।

जहाँ मिलती हैं तुझे चंद खुशियाँ ,
तू उस ओर चल देता है।

बहुत दूर तक चले जाता है तू,
उन नई खुशियों के साथ।

नये नये सपने संजोता है।

भूल जाता है तब तू उन पुरानी खुशियों को,
जो तेरे लिये कभी नई खुशियाँ थी,
जिन्हें तलाशा था तूने इसी तरह,
पुरानी खुशियों को पीछे छोङकर...........


क्या जो साथ है तेरे,
तू भी उनके साथ है ?

हस्ती मिटती नहीं जिनकी........

चिट्ठाजगत
उन दिनों हालात बहुत खराब थे। वो दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे थे। लगभग 10 लाख लोग भूख से मरे थे। तभी अचानक समय ने करवट बदली और खुशहाली के दिन शुरू हुए। एक ऐसी क्रान्ति की शुरूआत हुई जिससे आज पूरा विश्व भली-भांति परिचित है और प्रेरणा लेता है।
हरित क्रांति। एक ऐसा सफल प्रयास और प्रयोग जिसने भारत के हरियाणा और पंजाब प्रदेश का स्वरूप बदलकर रख दिया। एक ऐसी क्राति जिसने वक्त की मार से त्रस्त और भूख से बिलखते भारत को अनाज दिया। सन् 1945-50 में शुरू हुए अनाज संकट से निपटने के लिए जब भारत के सारे प्रयास असफल हो गय़े तब अमेरिकी वैञानिक नोरमन बोरलॉग, एम एस स्वामिनाथन सरीखे वैञानिकों ने उन्नत बीजो की किस्म तैयार करके एवं खेती की प्रणालियों में सुधार करके कृषि के बिगङ़ते हालात को सुधारा। फलस्वरूप 1960 के दशक में कृषि उत्पादन में तेजी से सुधार हुआ और देश के इतिहास में हरित क्रांति नामक उपलब्धि का एक सुनहरा पृष्ठ जुड़ गया।
आज उस सुनहरे इतिहास में अपना योगदान देने वाले एक नायक ने हमें अलविदा कह दिया है। नोरमन बोरलॉग का निधन हो गया है। 12 सितम्बर 2009 को टेक्सास के डलास शहर में उनका देहांत हुआ। वो कैंसर की बीमारी से पीडित थे।
दुख की बात तो यह है कि अमूल्य योगदान के बावजूद भी उनके देहांत पर शोक व्यक्त करने वाला भी आज कोई नहीं है। जिस भूख से बिलखते भारत को संतृप्त करने के लिए उन्होंने योगदान दिया, उस भारत के कुछ समाचार पत्रों के छोटे कॉलम के अलावा उनकी मृत्यु के समाचार को किसी ने तरज़ीह नहीं दी। पंजाब और हरियाणा...........बोरलॉग ने जिन्हें देश के नक्शे पर कृषि के क्षेत्र में अग्रणी स्थान पर लाकर खडा कर दिया............इन राज्यों में कुछ ही चुनिंदा लोग होंगे जिन्हें बोरलॉग का नाम मालूम होगा..........उनकी मृत्यु की ख़बर तो दूर की बात है।
मुझे याद है कि पिछले दिनों नोरमन बोरलॉग की ही तरह थियेटर की दुनिया के महानायक हबीब तनवीर का देहांत हुआ था, तब भी बहुत ही कम लोगों को इसकी ख़बर थी। अधिकांश लोगों को तो तनवीर की मौत के बाद ही मालूम चला कि तनवीर नाम की भी कोई शख्सियत इस देश में मौजूद थी।
बहरहाल इस देश और विदेश में ऐसी शख्सियतें तो हर दिन मिटती हैं लेकिन भारतवासियो के पास उन्हें याद करने और जानने का वक्त ही कहाँ। आखिर यहाँ माइकल जैक्सन जो है जो मौत के 2 महीनों बाद भी ख़बरों में जिन्दा है। न जाने क्यों ? शायद वो हमेशा विवादों में घिरा रहता था......इसलिए.....या शायद भारतवासी ही उसे याद रखना चाहते हैं।




राम मस्जिद में कब से ..........


बस दिल्ली से शाम ६ बजे चली। कुल २०-२५ सवारियां ही थी बस में। जिनमे लगभग १४-१५ मुसलमान यात्री भी मौजूद थे।

"मुसलमान".................. ।

कितना अजीब लगता है न जब इन्हे भीड़ या अकेले में देखकर 'मुसलमान' कहकर संबोधित किया जाता है। हिंदू को तो हिंदू कहकर नही पुकारा जाता। उन्हें तो अक्सर उनके नाम से या ज़्यादा से ज़्यादा अगर नाम न मालूम हो तो "ओ भाई" कहकर संबोधित किया जाता है। सफ़ेद टोपी लगाये और सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहने ये लोग बेहद शरीफ लग रहे थे..........शरीफ लगने का मतलब क्या होता है वो निहायती शरीफ इंसान ही थे। हम जैसे। वो तो केवल दूसरों की नज़रें ही थी जो उन्हें बुरा समझ रही थी और भेद-भाव की लपटों से धीमे-धीमे सुलगा रही थी।

शाम का वक्त होने की वजह से ट्रैफिक ज्यादा था और बस धीरे धीरे चल रही थी। लगभग ५० किलोमीटर आने के बाद एक आदमी ड्राईवर के पास आया दरख़्वास्त की कि " मेहरबानी करके गाड़ी कुछ देर के लिए रोक लीजिये। सामने मस्ज़िद है और नमाज़ का वक़्त भी हो रहा है। अगर आप गाड़ी कुछ देर रोक लें तो हम नमाज़ पढ़ लेंगे। " ड्राईवर ने बिना किसी सवाल जवाब के गाड़ी साइड में लगा दी।

गाड़ी रुकते ही सभी मुसलमान भाई नमाज़ पढने के लिए बस से उतरे और मस्ज़िद में चले गए। लेकिन ये बात कुछ यात्रियों को नागवार गुजरी। उन्होंने ड्राईवर और कंडक्टर का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें देर हो रही है नमाज़ के लिये उसने गाड़ी क्यों रोक दी ? ड्राईवर ने उन्हें बहुत समझाने कि कोशिश की लेकिन मामला और उलझता गया। दरअसल कुछ यात्री इस बात को लेकर ज़्यादा आक्रोशित हो रहे थे कि गाड़ी को नमाज़ के लिए क्यों रोका गया। मुझे यकीन नही हो रहा था कि ये इसी भारत के लोग हैं जिन्हें पल-पल ये सिखाया जाता है कि सभी धर्मों को समान समझना चाहिए और प्रत्येक इंसान कि धार्मिक भावना का सम्मान करना चाहिए।

एक तरफ़ "अजा़न" अता हो रही थी तो दूसरी तरफ़ हिंदुत्व का अदृश्य चोला ओढे कुछ यात्रियों ने ड्राईवर और कंडक्टर का बहिष्कार इस तरह कर दिया जैसे भाजपा ने जसवंत सिंह का किया था। जसवंत सिंह का गुनाह केवल इतना है कि उन्होंने एक हिंदू राष्ट्र की हिंदूत्ववादी राजनीतिक पार्टी में रहते हुए एक ऐसे महान व्यक्ति का पक्ष लिया जो कि दूसरे धर्म के थे। और "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय'' का नारा लिखी उत्तर प्रदेश परिवहन की बस के चालक की ग़लती इतनी है कि उसने कुछ लोगों कि धार्मिक भावनाओं का ख़्याल रखा।

बहस बढ़ चुकी थी। उत्तेजित यात्रियों ने बस के ड्राईवर पर सरकारी पद के मनचाहे उपयोग का आरोप लगाते हुए पुलिस बुलाने तक की धमकी दे डाली। आख़िर में ड्राईवर ने उत्तेजित यात्रियों से बोला कि-

"आप ख़ुद तो राम का नाम लेते नही हो अगर कोई दूसरा राम का नाम ले रहा है तो उसमे परेशान क्यों होते हो ?"

इतने में भीड़ में से एक स्तब्ध कर देने वाला स्वर गूंजा-

" राम मस्जिद में कब से बसने लगे ?"

राम मस्जिद में कब से बसने लगे ?" इस वाक्य ने मुझे स्तब्ध भी किया और आश्चर्यचकित भी। मैं यह सोचने लगा कि क्या राम मन्दिर में बसने के लिए ही है ? क्या अल्लाह का स्थान केवल मस्ज़िद में ही है ? या ईसामसीह केवल गिरिजाघरों तक ही सीमित है ?

ड्राईवर के मुंह से निकले " राम " का तात्पर्य उस भगवान् , उस सर्वशक्ति से है जिसकी पूजा हर जगह , हर धर्म , हर संप्रदाय में की जाती है केवल नाम अलग है।

लेकिन फिर मुझे महसूस हुआ कि मैं भारत में हूँ। जो कहने को "अनेकता में एकता" में विश्वास रखता है , मगर असल में हम एक होते हुए भी अनेक हैं , विखण्डित हो चुके हैं , धर्म कि दीवारों में जकडे हुए हैं।

शायद भारत से बड़ा सांप्रदायिक देश कोई दूसरा नही होगा। यहाँ राम मन्दिर में ही बसते हैं। यहाँ राम की पूजा मन्दिर में ही होती है।

और अगर मस्ज़िद में राम होता तो शायद बाबरी मस्ज़िद तोडी नहीं जाती............. ।



(इस लेख के द्वारा किसी भी व्यक्ति या संप्रदाय की भावनाओ को आहत करने का प्रयत्न नही किया गया है। लेख लेखक के स्वयं के विचार एवं अनुभव हैं। अगर फ़िर भी इस लेख द्वारा किसी की धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुँचती है तो कृपया क्षमा करें। )

उम्मीदें



हमेशा की तरह आज भी एक इतवार का दिन था। शाम का वक़्त था। बंगला साहिब गुरुद्वारा,दिल्ली। लगभग एक साल से हर इतवार आता हूँ यहाँ। कोई कोई इतवार नही भी आता,जब मन नही करता या भगवान् पर गुस्सा आ रहा हो। जाने कहाँ से आदत लग गई गुरूद्वारे आने की ? पहले सोचता था कि जो दिखाई नही देता उसके सामने क्यूँ झुकूं ? क्यूँ मत्था टेकूं उसके सामने। धीरे धीरे उसकी ताकत का अंदाजा हुआ और मैं पूर्ण नास्तिक से आस्तिक बन गया। सच बोलू तो मेरे ख्याल से इंसान का सबसे बड़ा आविष्कार ही भगवान् है।
हर इतवार की तरह आज भी यहाँ भीड़ है। रंग बिरंगे कपडों में लिपटे लोगों की भीड़। इधर, उधर, जोड़ा घर के पास, सरोवर के पास, निशान साहिब के पास। हर तरफ़ भीड़ ही भीड़। जिनके चेहरे पर गुरुद्वारे आने से ज्यादा खुशी अपने दोस्तों से और सगे- सम्बन्धियों से मिलने की थी। एक ऐसी भीड़ जो औरों से अलग थी। जिन्हें शायद दसों गुरुओं के नाम भी नही मालूम थे लेकिन वो सरोवर की मछलियाँ देखकर भी बहुत खुश थे। जगह- जगह बातें करते लोग। जाने वो कौन सी बातें कर रहे थे जो केवल गुरूद्वारे में ही की जा सकती थी। शायद वो कडाह प्रसाद के स्वाद के बारे में बातें कर रहे थे और कुछ लोग दूसरी बातों में मशगूल थे।
ऐसे ही दृश्यों को देखकर और ग्रन्थ साहिब के दर्शन करने के बाद जब जूते लेने के लिए जोड़े घर पहुँचा तो देखा एक बूढा आदमी हाथ में फटा हुआ थैला लेकर एक बेंच पर बैठा हुआ है। जूते लेकर पहनने के लिए मैं भी बेंच पर एक कोने में बैठ गया। जूते पहनकर हटा ही था कि दो लड़के जिसमे से एक सिख था पगड़ी पहने हुए, मेरे और बूढे आदमी के बीच में आकर बैठ गए। इतने में उनमे से एक ने बूढे से पूछा-

"क्या बात है बहुत देर से यहाँ बैठे हो ?"
बूढे ने कोई जवाब नही दिया। इतने में लड़के ने भांप लिया कि बूढा बिहार का रहने वाला है। उसने दुबारा पूछा-

"
कहाँ से आए हो ? बिहार से?"
बूढे ने उसकी तरफ इस तरह देखा मानो मन ही मन पूछ रहा हो की अगर जानते ही हो तो पूछा क्यों। और हाँ में सर हिला दिया। लड़के ने दुबारा पूछा -
"क्या करने आए हो ? घूमने ?"
इसी बीच सिख लड़के ने उसे बीच में टोका और चलने को बोला। सिख लड़के की बात अनसुनी करके बूढे ने कहा कि-
" काम की तलाश में आया हूँ। हो सकता है गुरूद्वारे में कोई काम मिल जाए। "
इतना सुनने के बाद दोनों लड़के जाने लगे और सिख लड़के ने बूढे से कहा-
" बाबा ये गुरुद्वारा है। यहाँ आराम करो, लंगर में खाना खाओ और वाहेगुरु का नाम जपो। यहाँ काम नही मिलेगा। "
दोनों चले गए लेकिन वो बूढा आदमी वहीं बैठा रहा। अपने फटे हुए थैले और उम्मीद के साथ। इसी उम्मीद के साथ कि शायद कोई काम मिल जाए। मुझे उसके चेहरे और आंखों में उम्मीद कि झलक साफ़ दिख रही थी। उसे शायद अपने पर विश्वास नही था लेकिन वाहेगुरु पर पूरा यकीन था। कुछ देर में मैं भी वहां से आ गया।
अगले ही दिन सुबह सुबह संयोग से मुझे फ़िर बंगला साहिब जाने का मौका मिला। पहुँचा तो देखा कि बूढा आदमी जो कल अपने थैले और उम्मीदों के साथ यहाँ था वो आज भी यहीं है। कल ही की तरह वो अकेला नही था आज भी उसका फटा हुआ थैला उसके साथ ही था। लेकिन आज उसकी उम्मीदें उसके साथ नही थी। वो शायद उसका साथ छोड़ चुकी थी। कुछ सेवादार उसे घेर कर खड़े थे और जाने को कह रहे थे। मैं बिना कुछ बोले उस बूढे के पास से चला आया। कुछ लोगों से बोलते हुए सुना कि-
"कल से यही बैठा है और बोलता है कि कुछ काम दे दो। जब सेवादारों ने मना किया तो बोलने लगा कि मुझे उम्मीद है कोई न कोई काम जरुर मिलेगा यहाँ पर। "
वहां से आते हुए मेरी आंखों में एक सवाल था -
" कि ये उम्मीदें क्यो टूट जाती हैं ?"
..................
.........................
................................और मैं फ़िर से नास्तिक बनता जा रहा था।

माननीय प्रधानमंत्री जी के लिए एक पत्र

सेवा में

माननीय प्रधानमंत्री जी

( भारत गणराज्य )


महोदय

आज अखबार के पन्ने पलटे तो मालूम हुआ की राजस्थान में गुर्जरों के लिए सरकारी नौकरियों में ५ % आरक्षण मंजूर किया जा चुका है और उन्हें अति पिछडी जाति का दर्जा भी प्राप्त हुआ है। जानकर अत्यन्त खुशी हुई।

इस विधेयक को पारित करने के लिए मंत्रिमंडल की कई बैठकें हुई। राज्यपाल एस के सिंह ने कहा कि इसे मंजूर करने में ही राजस्थान का हित है और तत्पश्चात उन्होंने इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए। अब मैं तो आपको यही कहूँगा कि राज्यपाल जी की ये हित वाली बात सौ फीसदी सही है। वरना फ़िर रेल की पटरिया उखाडी जाती,सड़को पर टायर जलाए जाते और आरक्षण की मांग में जी-जान से जुटे कितने ही रणबांकुरों की जान जाती। अच्छा ही हुआ जो विधेयक मंजूर कर लिया गया। अगर न किया जाता तो किरोडी बैंसला ने तो फ़िर से कमर कस ही ली थी और सरकारी कागजों की आरक्षित श्रेणी में शामिल होने के लिए " उत्पात मचाओ और अपना हक़ पाओ " की योजना बना ही डाली थी।

खैर, आप तो अन्दर की बातों से अवगत ही होंगे। माननीय प्रधानमंत्री जी मेरा आपको एक सुझाव है। क्यो नही आप देश की सभी जातियों और धर्मों को आरक्षित करने की एक योजना बनाते हैं और इसे संसद में पेश करते हैं। मंजूरी न मिलने का तो सवाल ही नही उठता, आखिर सरकारी संपत्ति की भी कोई अहमियत है, ऐसे कब तक जलाई जाती रहेगी। आपके इस प्रयास से सारा किस्सा ही ख़त्म हो जाएगा। न कोई मांग न कोई बवाल। न ही सरकारी संपत्ति का नुक्सान। और तो और लगे हाथ देश की वन्य प्रजातियों को भी आरक्षण का कीमती तोहफा दे दीजिये। क्या मालूम कल ये भी अपनी भाषा में आरक्षण की मांग करने लगें। बल्कि मैं तो ये कहूँगा की आरक्षण को मौलिक अधिकारों में भी शामिल कर लिया जाए तो आपकी अति कृपा होगी।

मालूम नही, आपको सुझाव देना फायदेमंद भी होगा या नही? हालांकि देश का प्रतिनिधित्व तो आप ही करते हैं फ़िर भी मुझे ऐसा लग रहा है कि पत्र १० जनपथ तक पहुँचाया जाता तो ज्यादा अच्छा होता।

धन्यवाद।


आपका आभारी-

भारत का एक नागरिक

( स्वयं को आरक्षित बनाने में प्रयासरत )

'सच का सामना' घोल रहा है समाज में जहर

video

"केवल २१ सवाल...जो दिला सकते हैं आपको १० लाख रूपये।"

"लेकिन जवाब होना चाहिए केवल सच।"

इन पंक्तियों को सुनकर कोई भी स्टार प्लस पर १५ जुलाई से दिखाए जा रहे इस गेम शो की तरफ़ आकर्षित हो सकता है। लेकिन सच कहलवाकर पैसे देने के इस खेल में जिन सवालों को पूछा जा रहा है वो निहायती शर्मिंदा कर देने वाले हैं। दरअसल रियलटी शो के नाम पर स्टार प्लस पर एक नया गेम शो दिखाया जा रहा है जिसमे प्रतिभागी से बेहद निजी सवालों को पूछा जा रहा है। कुछ अलग दिखने की दौड़ में इस कार्यक्रम ने कम ही समय में शोहरत तो जरुर बटोर ली है परन्तु इस कार्यक्रम को लेकर विवाद भी उठ खड़े हुए हैं।

कार्यक्रम के पिछले कुछ प्रसारणों को देखा जाए तो उसमे प्रतिभागियों से ऐसे प्रश्न भी पूछे गए हैं जो उनके पारिवारिक जीवन में जहर घोल सकते हैं। मसलन एक शो के दौरान एक महिला से पूछा गया की "क्या वो किसी दूसरे पुरूष के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना पसंद करेंगी अगर उनके पति को मालूम न चले तो?"जाहिर सी बात है की किसी महिला से हजारो टेलिविज़न दर्शकों के सामने ऐसा प्रश्न पूछा जाना, मर्यादा का उल्लंघन है और वो भी ऐसे वक्त में जब वहां पर महिला के पति के साथ-साथ उसका पूरा परिवार मौजूद था।

हालांकि कर्यक्रम निर्माताओं और स्टार प्लस के विरूद्व न्यायालय में याचिका दायर की जा चुकी है परन्तु पैसे की चाहत में गोपनीय बातों के जरिये नैतिकता का मजाक उडाना कहाँ तक सही है यह आपसे और हमसे बेहतर शायद कोई नही समझता.....जिसे शो में जीतने वाली १० लाख की रकम तो नज़र आती है "लाई डिटेक्टर" के झूठे पैमाने के जरिये ख़ुद को सरेआम नंगा किया जाना नही दिखाई देता।