माननीय प्रधानमंत्री जी के लिए एक पत्र

सेवा में

माननीय प्रधानमंत्री जी

( भारत गणराज्य )


महोदय

आज अखबार के पन्ने पलटे तो मालूम हुआ की राजस्थान में गुर्जरों के लिए सरकारी नौकरियों में ५ % आरक्षण मंजूर किया जा चुका है और उन्हें अति पिछडी जाति का दर्जा भी प्राप्त हुआ है। जानकर अत्यन्त खुशी हुई।

इस विधेयक को पारित करने के लिए मंत्रिमंडल की कई बैठकें हुई। राज्यपाल एस के सिंह ने कहा कि इसे मंजूर करने में ही राजस्थान का हित है और तत्पश्चात उन्होंने इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए। अब मैं तो आपको यही कहूँगा कि राज्यपाल जी की ये हित वाली बात सौ फीसदी सही है। वरना फ़िर रेल की पटरिया उखाडी जाती,सड़को पर टायर जलाए जाते और आरक्षण की मांग में जी-जान से जुटे कितने ही रणबांकुरों की जान जाती। अच्छा ही हुआ जो विधेयक मंजूर कर लिया गया। अगर न किया जाता तो किरोडी बैंसला ने तो फ़िर से कमर कस ही ली थी और सरकारी कागजों की आरक्षित श्रेणी में शामिल होने के लिए " उत्पात मचाओ और अपना हक़ पाओ " की योजना बना ही डाली थी।

खैर, आप तो अन्दर की बातों से अवगत ही होंगे। माननीय प्रधानमंत्री जी मेरा आपको एक सुझाव है। क्यो नही आप देश की सभी जातियों और धर्मों को आरक्षित करने की एक योजना बनाते हैं और इसे संसद में पेश करते हैं। मंजूरी न मिलने का तो सवाल ही नही उठता, आखिर सरकारी संपत्ति की भी कोई अहमियत है, ऐसे कब तक जलाई जाती रहेगी। आपके इस प्रयास से सारा किस्सा ही ख़त्म हो जाएगा। न कोई मांग न कोई बवाल। न ही सरकारी संपत्ति का नुक्सान। और तो और लगे हाथ देश की वन्य प्रजातियों को भी आरक्षण का कीमती तोहफा दे दीजिये। क्या मालूम कल ये भी अपनी भाषा में आरक्षण की मांग करने लगें। बल्कि मैं तो ये कहूँगा की आरक्षण को मौलिक अधिकारों में भी शामिल कर लिया जाए तो आपकी अति कृपा होगी।

मालूम नही, आपको सुझाव देना फायदेमंद भी होगा या नही? हालांकि देश का प्रतिनिधित्व तो आप ही करते हैं फ़िर भी मुझे ऐसा लग रहा है कि पत्र १० जनपथ तक पहुँचाया जाता तो ज्यादा अच्छा होता।

धन्यवाद।


आपका आभारी-

भारत का एक नागरिक

( स्वयं को आरक्षित बनाने में प्रयासरत )

'सच का सामना' घोल रहा है समाज में जहर

video

"केवल २१ सवाल...जो दिला सकते हैं आपको १० लाख रूपये।"

"लेकिन जवाब होना चाहिए केवल सच।"

इन पंक्तियों को सुनकर कोई भी स्टार प्लस पर १५ जुलाई से दिखाए जा रहे इस गेम शो की तरफ़ आकर्षित हो सकता है। लेकिन सच कहलवाकर पैसे देने के इस खेल में जिन सवालों को पूछा जा रहा है वो निहायती शर्मिंदा कर देने वाले हैं। दरअसल रियलटी शो के नाम पर स्टार प्लस पर एक नया गेम शो दिखाया जा रहा है जिसमे प्रतिभागी से बेहद निजी सवालों को पूछा जा रहा है। कुछ अलग दिखने की दौड़ में इस कार्यक्रम ने कम ही समय में शोहरत तो जरुर बटोर ली है परन्तु इस कार्यक्रम को लेकर विवाद भी उठ खड़े हुए हैं।

कार्यक्रम के पिछले कुछ प्रसारणों को देखा जाए तो उसमे प्रतिभागियों से ऐसे प्रश्न भी पूछे गए हैं जो उनके पारिवारिक जीवन में जहर घोल सकते हैं। मसलन एक शो के दौरान एक महिला से पूछा गया की "क्या वो किसी दूसरे पुरूष के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना पसंद करेंगी अगर उनके पति को मालूम न चले तो?"जाहिर सी बात है की किसी महिला से हजारो टेलिविज़न दर्शकों के सामने ऐसा प्रश्न पूछा जाना, मर्यादा का उल्लंघन है और वो भी ऐसे वक्त में जब वहां पर महिला के पति के साथ-साथ उसका पूरा परिवार मौजूद था।

हालांकि कर्यक्रम निर्माताओं और स्टार प्लस के विरूद्व न्यायालय में याचिका दायर की जा चुकी है परन्तु पैसे की चाहत में गोपनीय बातों के जरिये नैतिकता का मजाक उडाना कहाँ तक सही है यह आपसे और हमसे बेहतर शायद कोई नही समझता.....जिसे शो में जीतने वाली १० लाख की रकम तो नज़र आती है "लाई डिटेक्टर" के झूठे पैमाने के जरिये ख़ुद को सरेआम नंगा किया जाना नही दिखाई देता।

भारतीय पुलिस की....मित्रता या क्रूरता?


आज एक किस्सा मेरे साथ घटित हुआ। मैं यमुना बैंक (दिल्ली) मेट्रो स्टेशन से लक्ष्मी नगर (दिल्ली) आने के लिए ऑटो रिक्शा ढूंढ रहा था। २०-३० रूपये की जगह सभी ऑटो चालक ५०-६० रूपये मांग रहे थे। हांलाकि सरकार ने मीटर तो लगवा दिए हैं लेकिन वो केवल देखने हेतु लगे हैं। ४ किलोमीटर की दूरी के लिए ५० रूपये जेब से निकलने बहुत भारी लग रहे थे, परन्तु मनोवृति ही कुछ ऐसी बन चुकी थी कि ५० रूपये देने में कुछ ख़ास दुःख भी नही लग रहा था (महीने की शुरुआत है ना )। इतने में अचानक देवदूत की तरह दिल्ली पुलिस का एक सिपाही मेरे सामने आ खड़ा हुआ और ऑटो चालक द्वारा मनमाना किराया मांगे जाने पर उसका चालान काटने लगा। इसी के साथ मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई और मुंह से ऑटो चालक के लिए निकला कि''ऐसा ही होना चाहिए इनके साथ''।

पुलिस वालो की ऐसी कर्तव्यनिष्ठा देखकर मेरे मन में भारतीय पुलिस के प्रति बने सारे अविश्वास के बदल छट गए। हमेशा से पुलिस का सौतेला व्यवहार देखकर उपजी नफरत अब प्यार और सत्कार में बदल रही थी। इस जगह अगर अपने आपको सौभाग्यवान मानूं तो अतिशयोक्ति नही होगी। निश्चय ही हर कोई मेरे जैसा भाग्यवान नही होता जिसे भारतीय पुलिस के ऐसे चमत्कारिक रूप के दर्शन होते होंगे....

शायद मेरे जितना भाग्यशाली रणबीर नही था,जिसे देहरादून पुलिस ने न जाने क्यो मार गिराया? जी हाँ...मालूम नही क्यों ? पुलिस के अलावा किसी को नही मालूम की क्यों उसका फर्जी एनकाउंटर किया गया? लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के मुताबिक गाजियाबाद का रणबीर किसी काम के सिलसिले में देहरादून आया था जहाँ देहरादून पुलिस से उसकी कुछ बहस हुई और पुलिस ने रणबीर को मार मामले को एनकाउंटर करार दिया। सुना है एनकाउंटर में गोलियाँ नज़दीक से मारी गई थी....और अगर गोलियाँ नज़दीक से मारी गई तो रणबीर पर अपराधी होने का आरोप लगाने वाली पुलिस उसे गिरफ्तार भी कर सकती थी।

खैर भारतीय पुलिस की ''कर्तव्य पलायनता '' का ब्यौरा आपको देने की शायद आवश्यकता नही होगी। यह मुझसे बेहतर आप ही जानते होंगे। इसे भारतीय पुलिस प्रशासन की सुस्ती कहें या कारपोरेट जगत की तेजी कि इस देश में पिज्जा और बर्गर तो ३० मिनट की गारंटी में आपके पास आ जायेंगे लेकिन पुलिस हिन्दी फिल्मों की तरह हमेशा घटना के बाद ही आती है।

और एक बात..अब हर इंसान मेरे जैसा भाग्यशाली नही होता कि अपराध या धोखाधडी का शिकार होते हुए उसे पुलिस सहायता मिल सके।


(यह लेख भारतीय पुलिस के लिए मेरे अपने विचार हैं। हर व्यक्ति के मन में पुलिस की छवि अलग हो सकती है। अपने मित्रो और पाठकों से अनुरोध है की लेख में हुई त्रुटियों के सम्बन्ध में माफ़ी चाहता हूँ और आप सभी से सुझावों की आशा रखता हूँ....उम्मीद है कलम चलती रहेगी.....धन्यवाद।)

इतिहास की दीवारों पर प्रेम की निशानियाँ


भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन एवं प्रमाणिक संस्कृति रही है। यहाँ की संस्कृति की प्रमाणिकता को सिद्ध करती हैं ''मूक'' खड़ी शिलाये,किले, खंडहर एवं प्राचीन इमारते जो अपने आप में उच्च वास्तुकला का नमूना है।

यहाँ मैंने ''मूक'' शब्द कारणवश प्रयोग किया है। बरसो से ये किले, इमारते एवं खंडहर मौन खड़े हैं। लाखो देशी विदेशी पर्यटक इन्हे देखने रोज आते हैं। परन्तु हम लोगो में से कुछ ऐसे भी हैं जो अपने प्रेम की प्रासंगिता को सिद्ध करने के लिए अपनी संस्कृति की परिचायक इन इमारतों को अपने हाथो नष्ट कर रहे हैं।

मेरा तात्पर्य प्राचीन इमारतो पर लिखी अश्लील पंक्तियों एवं प्रेम प्रसंगों से है जो प्यार में पागल दीवानों द्वारा इन दीवारों पर खुरच खुरच कर लिखी जाती हैं और ये ऐतिहासिक इमारते बरसो से अपने इस उपहास को चुपचाप सहन कर रही हैं इसलिए मैंने इन्हे ''मौन'' कहा है।

वैसे तो प्राचीन वास्तुशिल्पो पर अपनी बेजोड़ कला का नमूना पेश करने वाले हजारो लोग होते हैं लेकिन इनमे भी सबसे ऊपर का स्थान है प्रेमी युगलों का। ये लोग दुनिया की नजरो से छिपते हुए इन खंडहरों में प्रेमालाप करने आते हैं और वापस जाते हुए अपने प्रेम की अमिट छाप दीवारों पर छोड़ जाते हैं। ''दीवारों पर दिल को भेदता हुआ कामदेव का तीर और बीच में प्रेमी जोडोका नाम'' जैसी आकृतिया आपको बहुत सी जगह दिख जाएँगी।

सच कहा जाए तो बहुत ही तुच्छ मानसिकता होती है ऐसी हरकते करने वालो की। आने वाली पीढी पर अपने प्रेम की छाप छोड़ने का यह तरीका कहा तक जायज है? हम अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का नाश कर रहे हैं। जरा सोचिये क्या प्रभाव पड़ता होगा उन विदेशी पर्यटकों पर जो इन्हे देखने हजारो मील दूर से आते हैं? क्या सोचते होंगे वो इन इमारतों को देखकर? देश में हजारो ऐसी ऐतिहासिक इमारते हैं जो आज इतिहास के बजाय कपड़ो की तरह बदले जाने वाले प्रेम की गवाह बनती जा रही हैं।

हम स्वयं ही बचा सकते हैं इनके अस्तित्व को। जरुरत है तो सिर्फ़ जागरूकता की। ये हमारे पूर्वजो की अमूल्य निशानिया हैं इन्हे संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है। विश्वास कीजिये अगर आप स्वयं इस दिशा में पहल करेंगे तो दूसरो को भी इसके महत्व का एहसास होगा।

(यह लेख मएरे जीवन का प्रथम लेख है,जिसे मैंने वर्ष २००५ में लिखा।)