राम मस्जिद में कब से ..........


बस दिल्ली से शाम ६ बजे चली। कुल २०-२५ सवारियां ही थी बस में। जिनमे लगभग १४-१५ मुसलमान यात्री भी मौजूद थे।

"मुसलमान".................. ।

कितना अजीब लगता है न जब इन्हे भीड़ या अकेले में देखकर 'मुसलमान' कहकर संबोधित किया जाता है। हिंदू को तो हिंदू कहकर नही पुकारा जाता। उन्हें तो अक्सर उनके नाम से या ज़्यादा से ज़्यादा अगर नाम न मालूम हो तो "ओ भाई" कहकर संबोधित किया जाता है। सफ़ेद टोपी लगाये और सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहने ये लोग बेहद शरीफ लग रहे थे..........शरीफ लगने का मतलब क्या होता है वो निहायती शरीफ इंसान ही थे। हम जैसे। वो तो केवल दूसरों की नज़रें ही थी जो उन्हें बुरा समझ रही थी और भेद-भाव की लपटों से धीमे-धीमे सुलगा रही थी।

शाम का वक्त होने की वजह से ट्रैफिक ज्यादा था और बस धीरे धीरे चल रही थी। लगभग ५० किलोमीटर आने के बाद एक आदमी ड्राईवर के पास आया दरख़्वास्त की कि " मेहरबानी करके गाड़ी कुछ देर के लिए रोक लीजिये। सामने मस्ज़िद है और नमाज़ का वक़्त भी हो रहा है। अगर आप गाड़ी कुछ देर रोक लें तो हम नमाज़ पढ़ लेंगे। " ड्राईवर ने बिना किसी सवाल जवाब के गाड़ी साइड में लगा दी।

गाड़ी रुकते ही सभी मुसलमान भाई नमाज़ पढने के लिए बस से उतरे और मस्ज़िद में चले गए। लेकिन ये बात कुछ यात्रियों को नागवार गुजरी। उन्होंने ड्राईवर और कंडक्टर का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें देर हो रही है नमाज़ के लिये उसने गाड़ी क्यों रोक दी ? ड्राईवर ने उन्हें बहुत समझाने कि कोशिश की लेकिन मामला और उलझता गया। दरअसल कुछ यात्री इस बात को लेकर ज़्यादा आक्रोशित हो रहे थे कि गाड़ी को नमाज़ के लिए क्यों रोका गया। मुझे यकीन नही हो रहा था कि ये इसी भारत के लोग हैं जिन्हें पल-पल ये सिखाया जाता है कि सभी धर्मों को समान समझना चाहिए और प्रत्येक इंसान कि धार्मिक भावना का सम्मान करना चाहिए।

एक तरफ़ "अजा़न" अता हो रही थी तो दूसरी तरफ़ हिंदुत्व का अदृश्य चोला ओढे कुछ यात्रियों ने ड्राईवर और कंडक्टर का बहिष्कार इस तरह कर दिया जैसे भाजपा ने जसवंत सिंह का किया था। जसवंत सिंह का गुनाह केवल इतना है कि उन्होंने एक हिंदू राष्ट्र की हिंदूत्ववादी राजनीतिक पार्टी में रहते हुए एक ऐसे महान व्यक्ति का पक्ष लिया जो कि दूसरे धर्म के थे। और "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय'' का नारा लिखी उत्तर प्रदेश परिवहन की बस के चालक की ग़लती इतनी है कि उसने कुछ लोगों कि धार्मिक भावनाओं का ख़्याल रखा।

बहस बढ़ चुकी थी। उत्तेजित यात्रियों ने बस के ड्राईवर पर सरकारी पद के मनचाहे उपयोग का आरोप लगाते हुए पुलिस बुलाने तक की धमकी दे डाली। आख़िर में ड्राईवर ने उत्तेजित यात्रियों से बोला कि-

"आप ख़ुद तो राम का नाम लेते नही हो अगर कोई दूसरा राम का नाम ले रहा है तो उसमे परेशान क्यों होते हो ?"

इतने में भीड़ में से एक स्तब्ध कर देने वाला स्वर गूंजा-

" राम मस्जिद में कब से बसने लगे ?"

राम मस्जिद में कब से बसने लगे ?" इस वाक्य ने मुझे स्तब्ध भी किया और आश्चर्यचकित भी। मैं यह सोचने लगा कि क्या राम मन्दिर में बसने के लिए ही है ? क्या अल्लाह का स्थान केवल मस्ज़िद में ही है ? या ईसामसीह केवल गिरिजाघरों तक ही सीमित है ?

ड्राईवर के मुंह से निकले " राम " का तात्पर्य उस भगवान् , उस सर्वशक्ति से है जिसकी पूजा हर जगह , हर धर्म , हर संप्रदाय में की जाती है केवल नाम अलग है।

लेकिन फिर मुझे महसूस हुआ कि मैं भारत में हूँ। जो कहने को "अनेकता में एकता" में विश्वास रखता है , मगर असल में हम एक होते हुए भी अनेक हैं , विखण्डित हो चुके हैं , धर्म कि दीवारों में जकडे हुए हैं।

शायद भारत से बड़ा सांप्रदायिक देश कोई दूसरा नही होगा। यहाँ राम मन्दिर में ही बसते हैं। यहाँ राम की पूजा मन्दिर में ही होती है।

और अगर मस्ज़िद में राम होता तो शायद बाबरी मस्ज़िद तोडी नहीं जाती............. ।



(इस लेख के द्वारा किसी भी व्यक्ति या संप्रदाय की भावनाओ को आहत करने का प्रयत्न नही किया गया है। लेख लेखक के स्वयं के विचार एवं अनुभव हैं। अगर फ़िर भी इस लेख द्वारा किसी की धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुँचती है तो कृपया क्षमा करें। )

उम्मीदें



हमेशा की तरह आज भी एक इतवार का दिन था। शाम का वक़्त था। बंगला साहिब गुरुद्वारा,दिल्ली। लगभग एक साल से हर इतवार आता हूँ यहाँ। कोई कोई इतवार नही भी आता,जब मन नही करता या भगवान् पर गुस्सा आ रहा हो। जाने कहाँ से आदत लग गई गुरूद्वारे आने की ? पहले सोचता था कि जो दिखाई नही देता उसके सामने क्यूँ झुकूं ? क्यूँ मत्था टेकूं उसके सामने। धीरे धीरे उसकी ताकत का अंदाजा हुआ और मैं पूर्ण नास्तिक से आस्तिक बन गया। सच बोलू तो मेरे ख्याल से इंसान का सबसे बड़ा आविष्कार ही भगवान् है।
हर इतवार की तरह आज भी यहाँ भीड़ है। रंग बिरंगे कपडों में लिपटे लोगों की भीड़। इधर, उधर, जोड़ा घर के पास, सरोवर के पास, निशान साहिब के पास। हर तरफ़ भीड़ ही भीड़। जिनके चेहरे पर गुरुद्वारे आने से ज्यादा खुशी अपने दोस्तों से और सगे- सम्बन्धियों से मिलने की थी। एक ऐसी भीड़ जो औरों से अलग थी। जिन्हें शायद दसों गुरुओं के नाम भी नही मालूम थे लेकिन वो सरोवर की मछलियाँ देखकर भी बहुत खुश थे। जगह- जगह बातें करते लोग। जाने वो कौन सी बातें कर रहे थे जो केवल गुरूद्वारे में ही की जा सकती थी। शायद वो कडाह प्रसाद के स्वाद के बारे में बातें कर रहे थे और कुछ लोग दूसरी बातों में मशगूल थे।
ऐसे ही दृश्यों को देखकर और ग्रन्थ साहिब के दर्शन करने के बाद जब जूते लेने के लिए जोड़े घर पहुँचा तो देखा एक बूढा आदमी हाथ में फटा हुआ थैला लेकर एक बेंच पर बैठा हुआ है। जूते लेकर पहनने के लिए मैं भी बेंच पर एक कोने में बैठ गया। जूते पहनकर हटा ही था कि दो लड़के जिसमे से एक सिख था पगड़ी पहने हुए, मेरे और बूढे आदमी के बीच में आकर बैठ गए। इतने में उनमे से एक ने बूढे से पूछा-

"क्या बात है बहुत देर से यहाँ बैठे हो ?"
बूढे ने कोई जवाब नही दिया। इतने में लड़के ने भांप लिया कि बूढा बिहार का रहने वाला है। उसने दुबारा पूछा-

"
कहाँ से आए हो ? बिहार से?"
बूढे ने उसकी तरफ इस तरह देखा मानो मन ही मन पूछ रहा हो की अगर जानते ही हो तो पूछा क्यों। और हाँ में सर हिला दिया। लड़के ने दुबारा पूछा -
"क्या करने आए हो ? घूमने ?"
इसी बीच सिख लड़के ने उसे बीच में टोका और चलने को बोला। सिख लड़के की बात अनसुनी करके बूढे ने कहा कि-
" काम की तलाश में आया हूँ। हो सकता है गुरूद्वारे में कोई काम मिल जाए। "
इतना सुनने के बाद दोनों लड़के जाने लगे और सिख लड़के ने बूढे से कहा-
" बाबा ये गुरुद्वारा है। यहाँ आराम करो, लंगर में खाना खाओ और वाहेगुरु का नाम जपो। यहाँ काम नही मिलेगा। "
दोनों चले गए लेकिन वो बूढा आदमी वहीं बैठा रहा। अपने फटे हुए थैले और उम्मीद के साथ। इसी उम्मीद के साथ कि शायद कोई काम मिल जाए। मुझे उसके चेहरे और आंखों में उम्मीद कि झलक साफ़ दिख रही थी। उसे शायद अपने पर विश्वास नही था लेकिन वाहेगुरु पर पूरा यकीन था। कुछ देर में मैं भी वहां से आ गया।
अगले ही दिन सुबह सुबह संयोग से मुझे फ़िर बंगला साहिब जाने का मौका मिला। पहुँचा तो देखा कि बूढा आदमी जो कल अपने थैले और उम्मीदों के साथ यहाँ था वो आज भी यहीं है। कल ही की तरह वो अकेला नही था आज भी उसका फटा हुआ थैला उसके साथ ही था। लेकिन आज उसकी उम्मीदें उसके साथ नही थी। वो शायद उसका साथ छोड़ चुकी थी। कुछ सेवादार उसे घेर कर खड़े थे और जाने को कह रहे थे। मैं बिना कुछ बोले उस बूढे के पास से चला आया। कुछ लोगों से बोलते हुए सुना कि-
"कल से यही बैठा है और बोलता है कि कुछ काम दे दो। जब सेवादारों ने मना किया तो बोलने लगा कि मुझे उम्मीद है कोई न कोई काम जरुर मिलेगा यहाँ पर। "
वहां से आते हुए मेरी आंखों में एक सवाल था -
" कि ये उम्मीदें क्यो टूट जाती हैं ?"
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................................और मैं फ़िर से नास्तिक बनता जा रहा था।