विज्ञापन हैं या मौजमस्ती का निमंत्रण-पत्र




आजकल समाचार पत्र पढते हुए महसूस होता है कि उसमें ज्यादातर जगह विज्ञापनों ने घेरी हुई है। बहुत अजीब लगता है जब अख़बार में ख़बरें कम विज्ञापन अधिक नज़र आते हैं। लेकिन तभी सामाजिक एवं धरातलीय वास्तविकता का सिद्धान्त दिमाग में कौंधता है कि व्यवसायिकता तो आज हर चीज़ में निहित है......और सभी क्षेत्रों की ही तरह पत्रकारिता में भी इसकी मध्यस्थता एक स्वीकृत आवश्यकता है। दरअसल व्यवसायिक विज्ञापनों के अभाव में आज किसी समाचार पत्र के अस्तित्व की परिकल्पना असंभव है।
वो शायद बहुत अच्छा वक्त रहा होगा जब वास्तव में समाचार पत्र पत्रकारिता का पर्याय हुआ करते थे और उनमें विज्ञापनों का समावेश न के बराबर हुआ करता था। कभी-कभार किसी समाचार पत्र में कोई सरकारी या गैर सरकारी विज्ञापन छप जाया करता था। धीरे-धीरे वक्त बदला......फिर पत्रकारिता बदली....और अब सब कुछ नया है। आज समाचार पत्र विज्ञापन ङायरेक्टरी में बदल रहे है। कभी-कभी तो किसी समाचार पत्र के सम्पूर्ण कवर पृष्ठ पर ही विज्ञापन होता है और ज़ाहिर सी बात है कि कवर पृष्ठ पर स्थान पाने के लिये उन्होंने काफ़ी क़ीमत चुकायी होगी।
ख़ैर...विज्ञापन दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है। बदलते सामाजिक परिवेश़ एवं आर्थिक परिस्थितियों में जीवित रहने के लिये यह संजीवनी बूटी के समान है।
मैं बहुत वक़्त से समाचार पत्र के कुछ विज्ञापनों पर ग़ौर कर रहा हूँ। अख़बार के पन्ने पलटते हुए कभी-कभी पूरा पृष्ठ ही इस श्रेणी के विज्ञापनों से पटा रहता है। 5-6 पंक्तियों के इन छोटे विज्ञापनों को देखकर पहले तो किसी को भी ये मज़ाक़िया लग सकते हैं लेकिन जब मैंने इनमें निहित भावार्थ पर गौर किया तो ये एक गम्भीर समस्या की ओर इशारा कर रहे थे। समस्या है रूपयों का लालच देकर युवाओं को ग़लत कामों की ओर धकेलना एवं लोगों को बेवक़ूफ बनाना।
दरअसल ये विज्ञापन समाचार पत्रों में "मसाज" एवं "फ्रेंङशिप" कॉलम के तहत प्रकाशित किये जाते हैं। जिनमें ''मसाज" के नाम पर एक घण्टे के लिये 10000 से 30000 रूपये तक की पेश़कश देकर युवाओं को फंसाया जाता है। जानकारी के लिये आपको बता देना चाहता हूँ कि मसाज एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तेल एवं अन्य प्राकृतिक लेप द्वारा शरीर की थकान दूर करने के लिये मालिश की जाती है। लेकिन शारीरिक थकान मिटाने की इस प्रक्रिया में आकर्षक एवं अश्लील विज्ञापनों की क्या आवश्यकता आ पङी। यह निश्चय ही जाँच का विषय है।
इस संदर्भ में जब मैंने अपने स्तर पर जाँच करने की कोशिश की एवं विज्ञापन में दिये गये दूरभाष नम्बर पर सम्पर्क साधा तो दूसरी तरफ़ से बात करने वाले व्यक्ति ने पहले तो बात करने से ही मना कर दिया। उसने कहा कि ऐसा कोई विज्ञापन उन्होनें नहीं छपवाया। समाचार पत्र का हवाला देने पर वह धीरे-धीरे मुद्दे पर आने लगा था और देखते ही देखते उसने मसाज के नाम पर 6 हज़ार रूपये में एक 18 साल की लङकी उपलब्ध कराने की पेश़कश कर ङाली। कुछ और अनसुलझे राज़ निकलवाने के प्रयास में जब मैंने पैसे ज़्यादा होने की बात कही तो उसने यह कहकर फो़न काट दिया कि " 6000 रूपये में आपको चीज़ भी तो अच्छी दिलवा रहे हैं। अगर चाहिये हो तो दुबारा फ़ोन कर लेना। "
यह निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देने वाली बातचीत थी। मुझे यक़ीन हो चला था कि अवश्य ही मसाज पार्लरों के नाम अख़बार में विज्ञापन देकर " देह व्यापार " जैसे कृत्य छुपे हुए लेकिन खुलेआम किये जा रहे हैं।
इसी प्रकार " फ्रैंङशिप " कॉलम के तहत छपने वाले विज्ञापन भी अपने अन्दर कई रहस्यों को छिपाये होते हैं जिनमें सांकेतिक भाषा का प्रयोग होता है। आश्चर्यचकित करने वाली बात तो यह है कि इन विज्ञापनों में खुलेतौर पर यह कहा जाता है कि आप जिस चाहे उस उम्र की लङकी के साथ दोस्ती कर सकते हैं। बात अगर दोस्ती तक ही सीमित रहती तो ठीक थी, लेकिन इन विज्ञापनों में खुलेतौर पर युवाओं को मौज़-मस्ती के लिये आमंत्रित किया जाता है। मसलन एक विज्ञापन में प्रकाशित किया गया है कि " खुले विचारों की सुन्दर लङकियो को मौ़ज-मस्ती के लिये युवाओं की आवश्यकता है। इच्छुक युवक सम्पर्क करें।" यहाँ मौज-मस्ती का तात्पर्य हम सभी अच्छी तरह जानते हैं। एक अन्य विज्ञापन में युवक-युवतिओं को दोस्ती के जरिये शारीरिक सम्बन्ध बनाने का न्यौता भी दिया गया है। विज्ञापनों की मौजूदगी की प्रमाणिकता के लिये मैं यहाँ विज्ञापनों की कतरनें प्रस्तुत कर रहा हूँ।
हास्यास्पद बात तो यह है कि इन विज्ञापनों में धोखेबाज़ों से सावधान रहने को भी कहा जाता है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी को हथियार बनाकर जिस तरह से कूछ लोग विज्ञापनों के माध्यम से इस प्रकार के जालसाजी एवं अश्लीलता के धन्धे में लिप्त हैं, उन्हें बढावा देने में समाचार पत्र संचालक भी कम ज़िम्मेदार नहीं। एक छोटी सी चेतावनी देकर वह स्वयं तो अपना पल्ला झा़ड लेते हैं और जानबूझकर इस गंभीर मामले से अनभिज्ञ बने बैठे हैं एवं पत्रकारिता में व्यवसायिकता के हस्तक्षेप का दुरूपयोग कर रहे हैं। जिन मामलों पर उन्हें पत्रकारिता के माध्यम से लगाम लगाने की ज़रूरत है, वह उन्ही मामलों में पत्रकारिता एवं विज्ञापन का प्रयोग एक उत्प्रेरक के रूप में कर रहे हैं

दैनिक जागरण की गलती

चिट्ठाजगत

26 सितम्बर 2009 के दैनिक जागरण समाचार पत्र के राष्ट्रीय संस्करण में एक अविश्वसनीय गलती की गयी। ये गलती समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर लीड स्टोरी में की गई, जिसमें उपाय के स्थान पर उपाए मुद्रित किया गया है। आशा है कि एक राष्ट्रीय स्तर का अख़बार होने के नाते दैनिक जागरण ऐसी गलती की पुनरावृत्ति नहीं करेगा।

हर पल नई तलाश

चिट्ठाजगत

(आज तक मैंने कोई कविता नहीं लिखी। हाँ शायद एक लिखी थी, वर्ष 2004 में....अधपकी ज़वानी के अधपके आवेश में आकर। लेकिन शायद वो कविता फ़िजूल थी एवं यहाँ लिखना अनुचित होगा। आज एक कविता लिख रहा हूँ। आप सभी से अनुरोध है कि भूल-चूक माफ करें एवं किसी भी गलती पर मेरा मार्गदर्शन करें।)



क्या जो साथ हैं तेरे,
तू भी उनके साथ है ?

क्या जो सोचता है तुझे हर पल,
तू भी उन्हें सोचता है पल-पल ?

हाँ तू सोचता है...........

लेकिन चन्द लम्हों के लिये,
केवल जब तू चाहता है उन्हें सोचना,
उन्हें याद करना।

तू तभी करता है याद उन्हें,
जब तुझे उनकी जरूरत होती है,
जब तू हताश हो जाता है,
कुछ नये की तलाश में।

वरना हर पल तू भटकता रहता है इधर-उधर,
कभी इस ओर कभी उस ओर,
कभी यहाँ कभी वहाँ।

जहाँ मिलती हैं तुझे चंद खुशियाँ ,
तू उस ओर चल देता है।

बहुत दूर तक चले जाता है तू,
उन नई खुशियों के साथ।

नये नये सपने संजोता है।

भूल जाता है तब तू उन पुरानी खुशियों को,
जो तेरे लिये कभी नई खुशियाँ थी,
जिन्हें तलाशा था तूने इसी तरह,
पुरानी खुशियों को पीछे छोङकर...........


क्या जो साथ है तेरे,
तू भी उनके साथ है ?

हस्ती मिटती नहीं जिनकी........

चिट्ठाजगत
उन दिनों हालात बहुत खराब थे। वो दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे थे। लगभग 10 लाख लोग भूख से मरे थे। तभी अचानक समय ने करवट बदली और खुशहाली के दिन शुरू हुए। एक ऐसी क्रान्ति की शुरूआत हुई जिससे आज पूरा विश्व भली-भांति परिचित है और प्रेरणा लेता है।
हरित क्रांति। एक ऐसा सफल प्रयास और प्रयोग जिसने भारत के हरियाणा और पंजाब प्रदेश का स्वरूप बदलकर रख दिया। एक ऐसी क्राति जिसने वक्त की मार से त्रस्त और भूख से बिलखते भारत को अनाज दिया। सन् 1945-50 में शुरू हुए अनाज संकट से निपटने के लिए जब भारत के सारे प्रयास असफल हो गय़े तब अमेरिकी वैञानिक नोरमन बोरलॉग, एम एस स्वामिनाथन सरीखे वैञानिकों ने उन्नत बीजो की किस्म तैयार करके एवं खेती की प्रणालियों में सुधार करके कृषि के बिगङ़ते हालात को सुधारा। फलस्वरूप 1960 के दशक में कृषि उत्पादन में तेजी से सुधार हुआ और देश के इतिहास में हरित क्रांति नामक उपलब्धि का एक सुनहरा पृष्ठ जुड़ गया।
आज उस सुनहरे इतिहास में अपना योगदान देने वाले एक नायक ने हमें अलविदा कह दिया है। नोरमन बोरलॉग का निधन हो गया है। 12 सितम्बर 2009 को टेक्सास के डलास शहर में उनका देहांत हुआ। वो कैंसर की बीमारी से पीडित थे।
दुख की बात तो यह है कि अमूल्य योगदान के बावजूद भी उनके देहांत पर शोक व्यक्त करने वाला भी आज कोई नहीं है। जिस भूख से बिलखते भारत को संतृप्त करने के लिए उन्होंने योगदान दिया, उस भारत के कुछ समाचार पत्रों के छोटे कॉलम के अलावा उनकी मृत्यु के समाचार को किसी ने तरज़ीह नहीं दी। पंजाब और हरियाणा...........बोरलॉग ने जिन्हें देश के नक्शे पर कृषि के क्षेत्र में अग्रणी स्थान पर लाकर खडा कर दिया............इन राज्यों में कुछ ही चुनिंदा लोग होंगे जिन्हें बोरलॉग का नाम मालूम होगा..........उनकी मृत्यु की ख़बर तो दूर की बात है।
मुझे याद है कि पिछले दिनों नोरमन बोरलॉग की ही तरह थियेटर की दुनिया के महानायक हबीब तनवीर का देहांत हुआ था, तब भी बहुत ही कम लोगों को इसकी ख़बर थी। अधिकांश लोगों को तो तनवीर की मौत के बाद ही मालूम चला कि तनवीर नाम की भी कोई शख्सियत इस देश में मौजूद थी।
बहरहाल इस देश और विदेश में ऐसी शख्सियतें तो हर दिन मिटती हैं लेकिन भारतवासियो के पास उन्हें याद करने और जानने का वक्त ही कहाँ। आखिर यहाँ माइकल जैक्सन जो है जो मौत के 2 महीनों बाद भी ख़बरों में जिन्दा है। न जाने क्यों ? शायद वो हमेशा विवादों में घिरा रहता था......इसलिए.....या शायद भारतवासी ही उसे याद रखना चाहते हैं।