क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?

आजकल मुझे हिन्दी के प्रति विशेष लगाव हो गया है। हर कार्य में हिन्दी की प्रयोग कर रहा हूँ। ज़्यादा से ज़यादा हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करता हूँ। लिखने में भी हिन्दी का ही इस्तेमाल करता हूँ। यहाँ तक की मेरे इस हिन्दी प्रेम से कम्प्यूटर और मोबाईल भी अछूता नहीं रहा। सोशल नेटवर्किंग में भी पूर्णरूप से हिन्दी। पराकाष्ठा तो यह है कि मोबाईल द्वारा संदेश भी अब हिन्दी में ही भेजता हूँ।
दरअसल हिन्दी के प्रति यह विशेष झुकाव तब हुआ जब मेरे कुछ शुभचिन्तकों ने मुझे बताया कि मेरी हिन्दी वर्तनी में बहुत सी अशुद्धिया हैं। उस वक़्त मुझे बह्त शर्मिन्दगी महसूस हुई थी कि खुद को हिन्दुस्तान का नागरिक कहने वाला इन्सान अगर ठीक से हिन्दी ही नहीं बोल सकता तो यह चिंता का विषय है। उसी समय मैनें सभी कार्य हिन्दी में ही करने का संकल्प लिया.......जो अभी तक चल रहा है। मैनें यह ठान लिया कि अपने सभी कार्य हिन्दी में ही किया करूँगा......आखिर राष्ट्रभाषा है भई। एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते अगर मै अपने स्तर पर ही हिन्दी के विकास के लिये कार्य करता हू तो इससे दूसरो को भी प्रेरणा मिले शायद।
खैर अब जब अपने दैनिक कार्यों मे हिन्दी को वरीयता दे रहा हूँ तो कम वक़्त में ही बहुत सी प्रतिक्रियायें मिलने लगी हैं। कुछ प्रोत्साहित करने वाली और कुछ मनोबल तोड़ने वाली..........। आजकल कोई मुझे झोलाछाप पत्रकार कहता है तो कोई कहता है......" क्या बात है भई आजकल तो हिन्दी में लिख रहे हो...। " अभी परसो ही एक मित्र ने मुझे ग़ालिब कहा। मालूम नहीं कि ग़ालिब क्यों कहा.....शायद मित्र ये सोचते हैं कि ग़ालिब हिन्दी में लिखते थे। हाँ अगर मित्र ने भारतेन्दु हरीश्चन्द्र, मुंशी प्रेमचंद या हजारीप्रसाद दि्वेदी कहा होता तो कुछ समझ भी आता।
अपने ही देश में हिन्दी के प्रयोग पर ऐसी प्रतिक्रेयायें पाकर मुझे दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। ऐसा लगता है जैसे अपने ही घर में जाने पर घर के सदस्य कहें कि " क्या बात है आज घर कैसे आये हो ? " ऐसे प्रश्नों को सुनकर मेरे ज़ेहन में आग लग जाती है..........अरे भई.......मेरा घर है....जब मर्जी आऊँ यार......।
आज एक सोशल नेटवर्किग वेबसाईट (अब मुझे नहीं मालूम कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट को हिन्दी में क्या कहेंगे। अभी सीख रहा हूँ भई.....पारंगत नहीं हुआ हूँ।) पर एक मित्र से गपशप करते हुए मैंने उन्हें हिन्दी में एक संदेश भेज दिया। हाँलाकि यह कोई अनोखा कारनामा नहीं था लेकिन प्रतिक्रिया वैसी ही थी......अपने ही घर में मेहमान वाली....." क्या बात है...हिन्दी ? "
मैंने कहा - हाँ।
मित्र - हिन्दी की प्रैक्टिस कर रहे होगे ?
मैने कहा - हाँ। तो इसमें दिक्कत क्या है ?
मित्र - नहीं कोई दिक्कत नहीं। तुम पत्रकारों के लिये ज़रूरी भी है। वैसे इतने हिन्दीभाषी क्यों होते जा रहे हो ?
मित्र के इस प्रश्न पर मैने गुस्से में कहा कि - देशप्रेम पनप उठा है......इसलिये हिन्दी का प्रयोग तेजी से कर रहा हूँ। जन्म के 21 साल बाद भारतीय होने पर गर्व महसूस कर रहा हू।
(वैसे मुझे मालूम नहीं कि मानव विकास सूचकाँक में 127वां स्थान रखने वाले भारत के वासी होने पर मुझे कभी गर्व महसूस भी हुआ है या नहीं......लेकिन आज भी जन..गण..मन की पंक्तियाँ सुनकर रोंगटे ज़रूर खडे हो जाते है।)
मित्र - एक बात बताओ कि खुद को भारतीय साबित करने के लिये या देश के प्रति वफ़ादार होने का श्रेय अपनी झोली में डालने के लिये.......क्या हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?
प्रश्न गम्भीर है और ता्र्किक भी। हर सवाल पर सोचने का मन तो नहीं करता लेकिन कुछ सवालों पर खुद ब खुद सोचने लगता हूँ।
क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ?
मित्र तो यह सवाल उठा कर चल दिये लेकिन मेरे दिमाग में संशय छोड गये।
मैने जब इस प्रश्न पर गौर किया तो पाया कि मेरा अधिक हिन्दी प्रयोग चंद दिनों का शौक या फ़ितूर हो सकता है लेकिन क्या कारण हैं कि आज भारत मे हिन्दी की इस तरह अनदेखी हो रही है ? इसके पीछे क्या कारण है कि हिन्दी बोलने में आज लोगों को इतना संकोच होता है ?
मानव विकास सूचकाँक पर 127वें स्थान पर होने की वजह शायद स्वदेशी उदासीनता और जरूरत मे ज़्यादा विदेशी लगाव ही है। जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी होने के बावजू़द भी वहाँ की संसद के सभी कार्य परकीय भाषा अंग्रेजी में होते हैं उस देश के वासियों में अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता होना स्वाभाविक है।
वैसे तो भारत को आज़ाद हुए 60 वर्ष से अधिक हो चुके हैं लेकिन फ़िर भी भारत के 70 प्रतिशत लोग 80 रूपये से भी कम मेहनताने में अपनी गुजर - बसर करते है। विज्ञान, कला, साहित्य, खेल लगभग हर क्षेत्र में स्वय को अग्रणी की दौड में शामिल रखने वाले भारत का विश्व के भ्रष्टाचार के मामले में अग्रणी देशों की सूची में 13वाँ स्थान है। काले धन के संरक्षण के लिये विख्यात स्विस बैंक में जमा सर्वाधिक काला धन भारत का ही है। ऐसे में वैश्वीकरण की होड़ में अपनी भाषा का निरादर एवं समूचे देश के अलावा केवल चंद लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल अत्यंत खतरनाक हो सकता है।
मैं यह नहीं कहता कि विदेशी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। मैं तो केवल यह कह रहा हूँ कि हम उसका भी इस्तेमाल करें लेकिन केवल परकीय भाषा का इस्तेमाल और हर प्रणाली में इसका हस्तक्षेप कहाँ तक जायज़ है ? अपनी भाषा पर निर्भर होने के मामले में चीन और जापान एक शानदार मिसाल हैं। अपना हर काम अपनी भाषा में करने के बावजूद भी यह देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं। दरअसल इन देशों ने वैश्वीकरण की मार को अपने ऊपर पड़ने ही नहीं दिया। इन्होनें विकास तो किया लेकिन अपने देश के विकास के साथ और अपनी भाषा के विकास के साथ। जबकि भारत विकास तो कर रहा है लेकिन यहाँ घुसपैठियों को ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाया जा रहा है।
यह घुसपैठिये मुगल शासनकाल में हुई अंग्रेजों की घुसपैठ से भी ज़्यादा खतरनाक है जिसमें हमने स्वयं को इनके सामने समर्पित कर दिया है। आज हम आज़ाद तो हैं लेकिन मुनाफ़े की होड और पश्चिमी चमक - दमक में दूसरों को तो खिला रहे हैं लेकिन अपना पेट भरने में असमर्थ है और अपनी पहचान अपनी मातृभाषा हिन्दी को भूल रहे है। अपनी भाषा को भूलकर हम विदेशी रंग में रंगते जा रहे है। अगर हम इसी गति मे चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी राष्ट्रभाषा विलुप्त होने की क़गार पर आ खड़ी होगी और इसे संरक्षण देने वाला कोई नहीं होगा क्योकि आज हम यह समझने लगे हैं कि..........
" क्या भारतीय होने के लिये हिन्दी बोलना ज़रूरी है ? "