एक सवाल... सिर्फ तुम्हारे लिए


ये तेरे शब्द ही हैं...
जो मुझे तेरे पास खींच लाते हैं...

तेरे ख़्याल मुझे...
अपने से लगते हैं...

महसूस करता हूँ कि...
कोई मुझसा भी सोचता है...

कोई है जो...
मुझको भी समझता है...

बावजूद इसके...

मैं चाहता हूँ तुझसे...
सुनना कुछ ख़ास...

कुछ बातें...
जो हो सिर्फ मेरे लिए...

जानता हूँ कि तेरे लिए...
मेरे वक़्त में...
शब्दों के मायने बदल जाते हैं...

जानता हूँ कि...
मेरे सामने होने पर...
शब्दों की जगह...
भावनायें ले लेती हैं...

और रह जाती है...
सिर्फ ख़ामोशी...

ऐसा क्यों होता है अक़्सर कि...
मेरे हिस्से में आती हैं सिर्फ तुम्हारी ख़ामोशी ?


हर रोज़ एक ग़लती


हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...

जानते हैं...

समझते हैं...

फिर भी अन्जान बने बैठे हैं दोनों...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...


मालूम है दोनो को ही...

वाक़िफ़ हैं अन्जाम से भी...

जानते हैं उनका हश्र भी...

फिर भी अन्जान बने बैठे हैं...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे हैं...


खो रहे हैं हर रोज हम एक-दूसरे में...

हो रहे हैं मदहोश पल-पल...

किये जा रहे हैं प्यार हम...

एक दूसरे के हुए जा रहे हैं हर पल...


लेकिन सब जानकर भी...

हर रोज़ एक ग़लती हम दोहराये जा रहे है...।

.

अब समय आ गया है धर्मनिरपेक्षता विरोधी और साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करने वाले ब्लागर्स एवं ब्लाग के प्रचार को खत्म करने का

( आज ये पोस्ट केवल इसलिये नहीं लिख रहा कि आप सबका ध्यान आकर्षित करूँ और ना ही किसी तरह की प्रसिद्धि बटोरना मेरा मकसद है। केवल ये सोच कर लिख रहा हूँ कि किसी को तो शुरूआत करनी होगी। पोस्ट का शीर्षक आपको किसी और के पोस्ट की नकल ज़रूर लग रहा होगा लेकिन ऐसा करना ज़रूरी था। )

पिछले चार महीने से ब्लागिंग कर रहा हूँ। शौकिया तौर पर करता हूँ और अभी भी नौसीखिया ही हूँ। जब शुरूआत की थी तब भी ज़्यादा नहीं लिखता था और आज भी ज़्यादा नहीं लिखता हूँ। लेकिन आजकल ब्लागिंग की दुनिया में डूबा ज़रूर रहता हूँ। अच्छा लगता है दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बैठे लोगों के विचार पढना और जानना। ब्लाग की आज़ादी की भी सीमा नहीं हर कोई जो मन में आता है लिख देता है अब जैसे मैं ही लिख रहा हूँ। लेकिन हम में से ही कुछ लोगों ने यह सोच लिया है कि वे कुछ भी लिखेंगे और कोई कुछ नहीं बोलेगा। ब्लाग की दुनिया में साम्प्रदायिकता और धर्म के नाम पर भडकीले लेख लिखने वालो का विरोध करने के लिये ही मैं आज ये पोस्ट लिख रहा हूँ।
दरअसल आज जब कुछ ब्लाग खंगालता हूँ तो बहुत ही तुच्छ मानसिकता से प्रभावित लोगों के लेख पढने को मिलते हैं। मालूम नहीं कि लोग ऐसा क्यों लिख रहे हैँ ? मुझे मालूम है कि ऐसी पोस्ट लिखने वाले लोगों के ब्लाग तो बहुत अधिक पढा जाता है। लेकिन क्या दूसरे धर्मों को नीचा दिखाना, लोगों में किसी सम्प्रदाय के प्रति गलत प्रचार करना, सार्वजनिक रूप किसी भी मुद्दे पर बिना तर्क के एकतरफा राय देना, किसी भी धर्म के प्रति नफरत का भाव दिखाना, किसी सम्प्रदाय के रीति-रीवाजों का उपहास उडाना और अपने रीति-रीवाजों को श्रेष्ठ ठहराना....सही है ? मेरी नजर मं तो ये सही नही हैं और मैं इन सबसे चिन्तित हूँ। मेरी तरह ही और भी कई लोग शायद ब्लागिंग के गिरते स्तर से चिन्तित हैं। इसी सबंध में मुझे एक महाशय का ई-मेल आया। ई-मेल की हू-ब-हू नकल यहाँ दे रहा हूँ -:

नमस्कार अमृत पाल सिंह जी ,

कैसे हो ? क्या हो रहा है आजकल । आपसे मेरा कोई खास वास्ता तो नहीं पर
आपके बारे में इतना सुना कि आज ईमेल के जरिये बात करने को मन व्याकुल हो
उठा । आपके ही क्षेत्र से मैं भी हूं । मित्र मेरा आपको मेल करने के
पीछे कुछ खास मकसद है । सर्वप्रथम मैं कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर आपकी अपनी
राय जानना चाहता हूँ ।

१- ब्लागिंग में जितने भी धर्म , जाति , महिला विरोधी , मुसलमान विरोधी ,
सेकुलरिज्म से जुड़े मुद्दे इत्यादि पर आप जिस भी तरह की विरोधी भावना
प्रकट करते हैं क्या वह करना जायज है अगर हां तो इसके पीछे के तर्क को
सामने रखिये ।

( उदाहरण - अब समय आ गया है हिन्दुविरोधी-देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण
समर्थक सैकुलर गिरोह के भ्रामक दुष्प्रचार को खत्म करनें का "
लिंक-
http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html) (
दूसरा इसी के जुड़ा हुआ मुद्दा देखें आप -गाय काटने वालो का क्यों ना सर
कलम कर दिया जाये " लिंक
-
http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_10.html )।

२- ब्लागिंग में आप भी देख रहे होगें कि एक तरह से कम्युनिटी सी बन गयी
है । कोई किसी को गाली दे रहा है तो कई किसी को ऐसे में हम सभी को इससे
बचना होगा । हम जो कुछ भी अपने साथ नहीं करते हैं वह भला किसी और के साथ
क्यों करें । कुल मिलाकर कि भेदभाव और ईष्या और जलन वाली बातों को पीछे
छोड़कर आगे बढ़े ।

३- अमृत पाल जी जिस तरह से हिन्दू और मुस्लिम विरोधी कमेंट दिये जाते हैं
बेनामी से और नाम से उससे आप भी शायद ही सहमत हो । हम सभी पढ़े लिखें हैं
और इस तरह के कृत्य सही तो नहीं माना जाना चाहिए । इससे बचाव करना होगा ।

४ - साथ ही मुझे तो ब्लागिंग से अब चिढ़ सी होने लगी है कारण स्पष्ट है
कि हम किसी से असहमत होते हैं तो लोगों को बुरा लगता है ऐसे में एक
सकारात्मक बहस संभव नहीं हो सकती । हां उलटे ही लोगों अगली पोस्ट आपके
नाम से जरूर कर देंगें ।



आप को मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफी चाहूंगा और एक सकारात्मक उत्तर
की प्रतिक्षा करूंगा ।


इस पोस्ट में अपने विचार लिख रहा हूँ इसलिये मेल करने वाले व्यक्ति का नाम नहीं लिखूँगा। हाँ...लेकिन मेल में दिये गये ब्लाग लिंक देने में परहेज नहीं करूँगा। क्योंकि जो गलत कर रहा है उसका विरोध ज़रूर करूँगा। ये विरोध केवल मेरा ही नहीं है और भी कई अन्य ब्लागर्स ऐसे वाहियात और भडकाऊ ब्लाग्स का विरोध टिप्पणियों के माध्यम से करते हैं लेकिन हैरत की बात यह है कि ऐसे भडकाऊ लेख लिखने वाले ब्लागर्स टिप्पणियों के ज़वाब भी बेहद असभ्य भाषा में देते हैं।
मुझे हैरत होती है ऐसे लेख लिखने वालों पर और ऐसे ही लेखों पर प्रशंसा रूपी टिप्पणियाँ करने वाले लोगों पर भी। मानवता विरोधी ऐसे विचारों पर ये टिप्पणी करना कि " क्या बात...क्या सुन्दर आलेख है " कहाँ तक जायज़ है ? यह तो समाज विरोधी और हानिकारक तत्वों को बढावा देना है। और बढावा भी केवल इसलिये ताकि कहीँ उनकी विरोधी टिप्पणियों से आहत होकर वो ब्लागर उनके पोस्टों को पढना ही ना छोड दे।
कई ऐसे ब्लाग पढने और उन पर आई टिप्पणियाँ पढकर मुझे बहुत दुख हुआ कि ऐसे प्रदूषित मानसिकता वाले ब्लागर्स को प्रोत्साहात्मक टिप्पणियाँ देने वाले लोगों में ब्लाग जगत के कुछ ऐसे धुरंधर भी शामिल होते हैं जिनकी लेखनी का मैं प्रशंसक हूँ और जिन्हें मैं आदर्श मानता हूँ। ऐसे ब्लागर्स से मेरी अपील है कि समाज में सस्ती लोकप्रियता हासिल कर शोहरत पाने वाला ऐसे लोगों का बहिष्कार और इन्हे और अधिक प्रोत्साहन ना दें।
जानता हूँ कि आप में से कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे। मैं परवाह नहीं करता। आप सभी का सहयोग मिलेगा तो बहुत खुशी मिलेगी।
अन्त में एक बात और कहना चाहूँगा कि
" मैं इसी तरह ज़हर उगलता रहूँगा....ना तो धर्म के खिलाफ़....ना देश के खिलाफ़.....और ना ही संस्कृति के खिलाफ़....केवल समाज में व्याप्त इन साम्प्रदायिक कीटाणुओं के खिलाफ़....जिन्हें मजा़ आता है हर बात पर धर्म और संस्कृति का ढोल पीटने में.....जो स्वयं ही पीडित हैं छोटी मानसिकता नामक गंभीर बीमारी से। "

" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "

बस के पिछले दरवाजे से चढते हुए ही उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। शायद बसों का किराया बढने का गुस्सा था भीतर जो डीटीसी की छोटी इकाई यानि कंडक्टर पर निकलने को आतुर हो रहा था। उनकी उम्र लगभग 65-70 साल थी। दरअसल ड्राईवर ने बस को स्टैंड से कुछ आगे रोका था और जब बस रूकी तो कंडक्टर ने भी ठेठ हरियाणवी में चलाये गये शब्दों के बाण से धकियाते हुए उन्हे अन्दर घुसने को कहा ( अगर ये दिल्ली परिवहन निगम की जगह ब्लू लाईन बस होती तो शर्तिया कंडक्टर उनको शब्दों के बाण की जगह अपने हाथों से धकियाता, लेकिन सरकारी कर्मचारी को अपनी कुर्सी से बडा प्रेम होता है सो कंडक्टर महोदय ने भी बिना अपना जगह से हिले सिर्फ़ शब्दों के ही बाण चलाये ) ।
इन्हीं शब्दों के बाणों से आहत बुजुर्ग के मुँह से आखिरकार कुछ शब्द फूट ही पडे। और वो शब्द थे-
" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "
बस की कुर्सियों से चिपके कुछ लोगों की ज़ुबान से दबी आवाज़ में मैंने ये कहते सुना कि " अंकल जी कंडक्टर को शिष्टाचार का पाठ तो पढा रहे हैं लेकिन खुद किस लहजे में बात कर रहे हैं। "
" तुझे शिष्टाचार नहीं आता क्या ? "
उस वक़्त मुझे भी यही लगा था कि शिष्टाचार का यह पाठ कितने अशिष्टाचार से पढाया जा रहा है।
मैंने सोचा भी कि अंकल जी को शिष्टाचार की सीमाओं का बोध कराऊँ।
लेकिन फिर मुझे भी शिष्टाचार का ख्याल आ गया। क्योंकि हमारे देश में बडों से सवाल-ज़वाब करना, पूछताछ करना और उन्हें अपने तर्क देना अशिष्टाचार की निशानी है ना.....।

मैं अक्सर ऐसा ही हो जाता हूँ...


अब तुझे क्या बताऊँ
कि क्या हो जाता है मुझे...

मैं अक्सर ऐसा ही
हो जाता हूँ...

जब- जब तुझमें अपनी गुम हो चुकी
पहचान को तलाशता हूँ

तलाश करते-करते
अक्सर खो भी जाता हूँ...

परेशान सा हो जाता हूँ
और सोचता हूँ
कि क्या तुझ में ही मेरा अस्तित्व है...

लौटकर आता हूँ
जब महत्त्वकांक्षाओं की इस दुनिया में
तो सर उठाती है
मेरे आत्मसम्मान की आवाज़...

सर उठाती है
बार-बार...

लेकिन भावनाओं के
बोझ तले दब जाती हैं हर बार...

और फिर मैं
तुझमें गुम हो जाता हूँ...

खो जाने देता हूँ तेरे अस्तित्व में
अपने अस्तित्व को...

इसी तरह की उठा-पटक
चलती है मेरे ज़ेहन में हर पल...

और इसी वजह से
अक्सर मैं ऐसा हो जाता हूँ...

अब तुझे क्या बताऊँ
कि क्या हो जाता है मुझे...।





माननीय प्रधानमंत्री जी के लिये पत्र


सेवा में

माननीय प्रधानमंत्री जी
भारत गणराज्य

महोदय,
यह आपके लिये मेरा दूसरा पत्र है। इसे भी हिन्दी में लिख रहा हूँ। लेकिन आज लिखते हुये डर भी लग रहा है। मालूम नहीं कि कब किधर से महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का जूता दनदनाता हुआ मेरी ओर आ जाये और मेरे मुँह पर मराठी भाषा की गहरी छाप छोङ जाये। अब मैं अबू आसिम आज़मी तो नहीं जो उनका खुलकर विरोध कर पाऊँगा और न ही कमाल आर ख़ान हूँ जो प्रतिशोध की अग्नि में सुलग कर लाखो रूपये खर्च कर एक फ़िल्म बना डालूँ। एक कहावत है ना कि यहाँ हर कोस पर पानी बदलता है और हर चार कोस पर बोली ( कहावत में अगर कोई त्रुटि हो तो एक ज़िम्मेदार प्रधानमंत्री होने के माफ़ कीजियेगा )। अब जब हर चार कोस पर भाषा और बोली बदलती है तो महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को क्या कोई विशेष अधिकार प्राप्त हैं जो हर व्यक्ति से मराठी बुलवायें और ना बोलने पर उसे पीटे। भई लोकतंत्र है जिसकी जो मरज़ी वो भाषा बोले। अगर लोकतंत्र के मायने ये होते हैं कि किसी भी व्यक्ति, समुदाय या वर्ग पर अपने बनाये हुये निर्देशों एवं कानूनों को प्रत्यारोपित किया जाये तो फ़िर संविधान में संशोधन करके राष्ट्रभाषा एवं राज्यभाषा से सम्बन्धित अधिनियमों को ही बदल डालिये।
पिछले कुछ समय से उत्तर भारत के लोगों के प्रति तिरस्कारपूर्ण हमले बढे हैं। मुझे मालूम है ( दरअसल सभी को मालूम है ) कि आप बिना ऊपरी निर्देश के कुछ नहीं बोलते, लेकिन ऐसे क्रियाकलापों जिनसे आम नागरिक के अधिकारों का हनन होता है और सीधे तौर पर भारतीय संविधान का उल्लंघन होता है, पर आपकी चुप्पी मुझे नागवार गुज़रती है। अब आप ही बताईये कि देश के नागरिक क्या मुंबई की दुकानों के साईनबोर्ड हैं जिन पर जब मर्ज़ी जबरन " मराठी भाषा हर हाल में अपनाओ आन्दोलन " की कूची चला दी ? हम तो भारतीय हैं सरकार। स्वतंत्रता के अधिकार अनुच्छेद 19 से 22 के तहत हमें अधिकार प्राप्त हैं देश में कहीं भी रहने और किसी भी भाषा में बोलने का।
15 अगस्त को लाल किले की ऊँची दीवार पर खङे होकर बुलेट प्रूफ़ काँच के पीछे से भाईचारे का संदेश देना शायद बहुत आसान है लेकिन क्षेत्रवाद और भाषायी राजनीति में पिट रहे और अपमानित हो रहे उन अभागे भारतीयें का दर्द समझ पाना बहुत मुश्किल है। आपसी सौहार्द में किरकिरापन लाने वाली घटनायें तो आप देखते और सुनते भी होंगे। ऐसे में आप उन्हें देख कर विचलित नहीं होते ? अगर आप सैकङो लोगों को मानवीयता और भाईचारे का भाषण दे सकते हैं तो उसी भाईचारे और अखण्डता के टुकङे होने का शोर आपको क्यों महसूस नहीं होता ?
और अगर आप उस शोर को सुनकर भी अंजान बने बैठे हैं तो मेरा यह पत्र पढकर भी आपको कोई फ़र्क नहीं पडेगा। लेकिन आशावादी होने की प्रवृत्ति पत्र लिखने पर मज़बूर कर रही है। वैसे मैं जानता हूँ कि आपको कोई फर्क नहीं पङेगा क्योंकि " महाराष्ट्र के सुनियोजित परिवर्तन " में जी-जान से जुटी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की बर्बरता का शिकार आम आदमी ही है आप नहीं। और दर्द उसी को महसूस होता है जिसे काँटा चुभता है।


धन्यवाद।

भवदीय-

अमृत पाल सिंह
( धर्म, संस्कृति एवं भाषा की कृत्रिम दीवार को मानवता के हथौङे से तोङने पर आमादा भारत का नागरिक )

पुरानी यादें

(आज अपनी पुरानी डायरी को टटोल रहा था तो 2 पन्ने हाथ लगे। 8/7/2003 वक़्त रात 9.45 पर लिखी हुई एक कविता मेरे हाथ लगी है। आज देखी तो हँसी आ गयी। उस समय शायद लिखते हुये कुछ अलग ही भावनायें रही होंगी मेरी। प्रेम में ख़ुद को कवि समझने लगा था शायद...और प्रेम भी प्रेम नहीं...केवल कुछ दिनों का ऐसा अतिआवश्यक आकर्षण कि जिसके बिना सारी दुनिया सूनी लगने लगती थी। सभी की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे पल ज़रूर आते हैं। ऐसे ही प्रेम से सराबोर होकर और भावनाओं के आवेग में तिनके की तरह बहकर मैंने जो कुछ भी लिखा उसे ज्यों का त्यों अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रहा हूँ। कविता एक ऐसी लड़की को ध्यान में रखकर लिखी गई है जिसके आकर्षण में मैं धृतराष्ट्र बन चुका था। बाकी आप स्वयं इस कविता में पढिये............)

हाय मेरा दुर्भाग्य
A Real Sad Story


दो साल वो हुई थी फ़ेल
इन दो सालों में उसने किया था काफ़ी लम्बा relief

इसी बात को जानकर मैंने सोचा
मुझको क्या पहुँचा सकती है वो तकलीफ़

उसकी त्रिवर्षीय योग्यता को देखकर
मैंने भी अपनी योग्यता को कम न समझा

मैंने सोचा कि
अगर उसके पास है कला
तो हमने भी ले रखी है ज्यामितीय कला

अगर उसके पास है गृहविज्ञान
तो हमारे भी पास है उच्च विज्ञान

अपने दिमाग के घमण्ड को कम किये बिना
मैंने उत्तीर्ण कर ली ग़हपरीक्षायें नम्बर कम किये बिना

इसी बीच कॉलेज में इतिहास-भूगोल के मास्टर
से ले लिया था पंगा
इसके प्रतिशोध में उसने मेरी इज़्जत को
किया था सबके सामने नंगा

जल्द ही निकट आ रहे थे दिन बोर्ड परीक्षा के
साथ ही शुरूआत होने जा रही थी सचिन तेंदुलकर की परीक्षा की

बोर्ड परीक्षाओं के मध्य में ही हो गया था वर्ल्ड कप
शुरू
इसी बात को ले कर नाराज़ हो रहे थे सभी अध्यापक और
गुरू

बोर्ड परीक्षा को भूलकर हम कर रहे थे होली खेलने की तैयारी
उस वक़्त वो लड़की कर रही थी अंग्रेजी की तैयारी

बिना किसी मुश्किल के हमने दे दिये बोर्ड के पेपर
परिणाम के दिन हम सब मिलकर पलट रहे थे रिजल्ट का पेपर

परिणाम संतोषजनक रहा
हुआ मैं द्विताय श्रेणी से पास
लेकिन मम्मी-पापा और सबको
लग रही थी प्रथम श्रेणी की आस

मैंने दी दिल को दिलासा
और पूछा
उस लड़की का क्या हुआ
क्या वो हो गई पास
किसी ने कहा
तोड़ दिया उसने तुम्हारा विश्वास
वो तो हो गयी प्रथम श्रेणी से पास

मैंने सोचा,
यो तो शायद उसका जादू-मंतर था
बस गृह विज्ञान और गणित का ही अंतर था

हाय मेरा दुर्भाग्य

मैं तो ये सब सुन के चौंका
निकल गया अब हाथ से मौका...

THE END

8/7/2003 9.45 P.M.

(लाल रंग से हाईलाईट की हुई सामग्री हू-ब-हू मेरी डायरी के 2 पन्नों की नकल है। शब्दों को भी बिना बदले एवं परिवर्तित किये वैसे ही प्रकाशित किया है जैसे उस वक़्त लिखा था। धन्यवाद।)

अब मान भी तो जाओ...




यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।
इस पल-पल सुलगती ज़िन्दगी को
यूँ नाराज़गी में ना गंवाओ।

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

क्या दोष होता है मेरा ?
या मुझसे हो जाती है कोई ख़ता।
हर रोज रूठकर मुझसे...
आखिर मिलता क्या है तुम्हे ?

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

हर पल तुम्हे मनाकर...
अब मैं भी थक चुका हूँ...
इस गैरज़रूरी रिश्ते से...
अब मुक्ति चाहता हूँ।

फिर भी
एक आखिरी दरख़्वास्त है तुमसे...

यूँ रूठकर रहोगी कब तक...?
अब मान भी तो जाओ।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नमूना


जामिया मीलिया इस्लामिया में एक स्थान पर लगे इस पोस्टर में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश को विश्व का नम्बर -1 आतंकवादी करार दिया गया है।

द्वितीय देवदास गाँधी स्मृति व्याख्यान जामिया मे सम्पन्न


नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2009 - महात्मा गाँधी के पुत्र देवदास गाँधी की याद में द्वितीय देवदास गाँधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन शुक्रवार को जामिया मीलिया इस्लामिया में किया गया। व्याख्यान का विषय था " गाँधी और अहिंसा की संभावना " । व्याख्यान का आयोजन जामिया में चल रहे तीन दिवसीय तालीमी मेले के अंतर्गत हिन्दी विभाग द्वारा कराया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शमीम हनफ़ी ने की एवं विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध इतिहासकार सुधीर चन्द्र को आमंत्रित किया गया था।
गौरतलब है कि महात्मा गाँधी ने अपने सबसे बड़े पुत्र देवदास गाँधी को सन् 1928 में हिन्दी की पढ़ाई के लिये जामिया भेजा था। जामिया में रहकर उन्होने हिन्दी की पढाई के साथ - साथ खादी का प्रचार भी किया। दे्वदास गाँधी छात्रों के बीच इतने लोकप्रिय थे कि जामिया के छात्रों नें उन्हे " अंजुमने - इत्तेहाद " की आजीवन सद्स्यता देकर सम्मानित किया था। वे 1930 तक जामिया में रहे। देवदास गाँधी के जामिया से लगाव एवं योगदान के चलते इस व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह इस व्याख्यान का द्वितीय आयोजन था। इससे पहले प्रथम व्याख्यान को स्वयं देवदास गाँधी के सुपुत्र एवं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी ने प्रस्तुत किया था।
कार्यक्रम की शुरूआत जामिया मीलिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष अब्दुल बिस्मिल्लाह ने की। इस मौके पर इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने देवदास गाँधी के जीवन की कई घटनाओं से अवगत कराया। उन्होनें देवदास गाँधी के खादी आन्दोलन एवं नमक सत्याग्रह आन्दोलन में योगदान पर भी चर्चा की।
व्याख्यान का उद्देश्य भविष्य मे गाँधी के आदर्शों एवं अहिंसा की परिकल्पना पर चर्चा करना एवं छात्रों को देवदास गाँधी के व्यक्तित्व से अवगत कराना था। व्याख्यान की अध्यक्षता शमीम हनफ़ी ने की। कार्यक्रम के आयोजन में अब्दुल बिस्मिल्लाह, दुर्गा प्रसाद गुप्त एवं चन्द्र देव यादव ने विशेष योगदान दिया।