दरअसल...तुम नीरस हो...।


ज़दीक होता हूँ जब तुम्हारे...
एक रोमांच होता है मेरे भीतर...
कितनी ही अभिलाषाएँ
मेरे मन में जन्म लेती हैं...
अभिलाषाएँ जो खुद ब खुद पनपती हैं...
और बढती ही जाती हैं...
वो कभी ख़त्म नहीं होती...
तुम मेरा विश्वास करो
इन पर मेरा नियंत्रण भी नहीं...
पर अफ़सोस
मेरी अभिलाषाएँ कुछ ऐसी हैं...
जो कभी पूरी नहीं होती

दूसरी तरफ
एक तुम हो...
शान्त...
निस्वार्थी...
अभिलाषाएँ तो हैं तुम्हारे भीतर भी
लेकिन शायद वे मृत हैं...
शुष्क हैं
तुम्हारी भावनाओं की तरह...

दरअसल
तुम नीरस हो...।