हमारे रिश्तो के बीच का " मैं "

(रात के अंधेरे में घास के शीर्ष पर चमकती उस ओस की बूँद को समर्पित जिसने मुझे जीवन का आईना दिखाया....तुम्हारा शुक्रिया।)

तेरे और मेरे बीच
इस " मैं " का आना मुझे अखरता है
बहुत अखरता है।

" मैं "...... ऐसा शब्द
जिसके आने से रिश्ते अपने नहीं लगते
एक अलगाव सा महसूस होता है।
इस " मैं " के दखल से
ऐसा महसूस होता है
जैसे कोई तीसरा आ जाता है हमारे दरमियाँ।

कभी तुम्हारा यह कहना कि
"मैं यह नहीं चाहती हूँ "
कभी मेरा तुमसे यह कहना कि
" मैं तुमसे ज़्यादा जानता हूँ "
हर एक वाक्य में एक " मैं " आ खडा होता है
हमारे बीच में
और चंद लम्हों में
ऐसे कितने ही " मैं " आ चुके होते हैं यहाँ
पलट कर देखता हूँ तो
कतार लग जाती है इस " मैं " की

क्यों ना इस " मैं " को
हम निकाल फेकें अपने बीच से
और फिर जो रिश्ता होगा हमारा
वो स्वार्थ की दासता से मुक्त होगा
उसमें " मैं " की मध्यस्थता नहीं होगी।